इस्लाम में कौन से खेल हैं जायज और शर्तें लगाना क्यों है नाजायज..यहां जानें सबकुछ
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Aligarh News: मौलाना इफराहीम हुसैन ने बताया कि इस्लाम में केवल वही शर्तें जायज़ मानी गई हैं जो नेकियों और भलाई के कामों के लिए लगाई जाएँ, जैसे कि नमाज़ पढ़ने, समाज सेवा करने, पढ़ाई में मेहनत करने या इंसानियत को फ़ायदा पहुँचाने जैसे काम.
अलीगढ़: आज के दौर में शर्त लगाना, ऑनलाइन गेम्स और जुए जैसी गतिविधियाँ युवाओं के बीच तेजी से बढ़ रही हैं. कई लोग इन्हें मनोरंजन या आमदनी का जरिया समझते हैं, मगर इस्लाम की नजर में इनकी हकीकत क्या है. यह जानना ज़रूरी है. शरीयत के मुताबिक कौन-से खेल और शर्तें जायज़ हैं और कौन-सी हराम, इस पर अधिक जानकारी के लिए लोकल 18 की टीम ने मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन से खास बातचीत की.
क्या है हराम
जानकारी देते हुए मुस्लिम धर्मगुरु चीफ मुफ्ती ऑफ उत्तर प्रदेश मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने बताया कि इस्लाम में शर्त लगाना, भविष्यवाणी करना या जुआ खेलना. जिसमें हार-जीत के आधार पर कमाई या नुकसान तय होता हो उसे नाजायज़ और हराम माना गया है. ऐसे किसी भी अमल में शरीयत ने सख्त मनाही की है, क्योंकि यह लालच, झूठ और दूसरों के नुकसान पर आधारित होता है.
क्या शर्तें लगाना जायज है
मौलाना इफराहीम हुसैन ने बताया कि इस्लाम में केवल वही शर्तें जायज़ मानी गई हैं जो नेकियों और भलाई के कामों के लिए लगाई जाएँ, जैसे कि नमाज़ पढ़ने, समाज सेवा करने, पढ़ाई में मेहनत करने या इंसानियत को फ़ायदा पहुँचाने जैसे कामों में किसी को प्रोत्साहित करने के लिए शर्त लगाना जायज़ है. ऐसे अमल इंसान को भलाई की तरफ़ ले जाते हैं, इसलिए इन्हें इस्लामिक नज़रिये से स्वीकार किया गया है.
कौन से गेम हैं जायज
उन्होंने आगे कहा कि गेम यानी खेल-कूद की भी दो तरह की शक्लें होती हैं. एक वे खेल जो जिस्मानी (फिजिकल) फ़ायदे के लिए खेले जाते हैं, जैसे कबड्डी, क्रिकेट, फुटबॉल आदि. ये खेल न केवल शरीर को मज़बूत बनाते हैं बल्कि सामाजिक मेलजोल और अनुशासन भी सिखाते हैं, इसलिए ऐसे खेल शरीयत के अनुसार जायज़ हैं. मौलाना ने कहा कि वहीं, जिन खेलों में जुए या शर्त का तत्व शामिल हो जहाँ जीत और हार पर पैसे या इनाम का दारोमदार हो वे नाजायज़ और हराम हैं. इस्लाम में ऐसे खेलों से दूर रहने की हिदायत दी गई है, क्योंकि यह इंसान को लालच और गलत राह की ओर ले जाते हैं.