इस्लाम मे क्या होती है इद्दत, महिलाओं के लिए इद्दत कब और क्यों है ज़रूरी
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Aligarh News: मौलाना ने कहा कि अगर पति का इंतकाल हो गया है, तो उसकी इद्दत की अवधि चार महीने दस दिन की होती है.
अलीगढ़: इस्लाम में शादी को बहुत पवित्र रिश्ता माना गया है, लेकिन जब किसी वजह से यह रिश्ता खत्म हो जाता है तब चाहे तलाक के ज़रिए या पति के इंतकाल के बाद तो शरीअत ने औरत के लिए एक अहम अमल तय किया है जिसे “इद्दत” कहा जाता है. इद्दत का मतलब है एक तयशुदा अवधि तक औरत का घर में रहकर खुद को गैर-ज़रूरी मेलजोल और बाहर निकलने से रोक लेना. इसका मकसद सिर्फ सामाजिक नहीं बल्कि शरीअती और आध्यात्मिक भी है, ताकि औरत की हिफाज़त, उसकी पवित्रता और उसके हक़ की हिफाज़त हो सके.
जानकारी देते हुए अलीगढ़ के मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन बताते हैं कि मुस्लिम महिलाओं के लिए इद्दत का हुक्म तब लागू होता है जब उनके पति इंतकाल हो जाए या तलाक दे दे. ऐसे हालात में औरत को एक निश्चित अवधि तक घर में रहकर अपने आप को स्थिर रखने, अपने इमोशंस को संभालने और अपनी सामाजिक और आध्यात्मिक स्थिति को बनाए रखने का अवसर मिलता है.
अगर तलाक हुआ है, तो औरत तीन मासिक चक्र (हैज़) तक इद्दत में बैठती है. यह अवधि इसलिए निर्धारित की गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि महिला गर्भवती तो नहीं है और उसकी भविष्य की योजना ठीक से बनाई जा सके.
क्या होती है इद्दत की अवधि
मौलाना ने कहा कि अगर पति का इंतकाल हो गया है, तो उसकी इद्दत की अवधि चार महीने दस दिन की होती है. वहीं, अगर औरत गर्भवती है, तो उसकी इद्दत बच्चे के जन्म तक रहती है. इद्दत के दौरान औरत का खर्चा, रहन-सहन और देखभाल की पूरी जिम्मेदारी शौहर या उसके परिवार की होती है. तलाक की स्थिति में भी बच्चे की परवरिश और उसका खर्चा शौहर की जिम्मेदारी में आता है.
औरत की हिफाजत है असली मकसद
मौलाना ने बताया कि इद्दत का असली मकसद सिर्फ औरत की हिफाज़त और इज़्ज़त ही नहीं, बल्कि उसे आध्यात्मिक समय, सोचने और अपने भावनाओं को समेटने का अवसर भी देना है. यह अवधि औरत को अपने जीवन के अगले फैसलों को समझदारी और सुकून के साथ लेने का समय प्रदान करती है. शरीअत में यह एक ऐसा हुक्म है जो सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से औरत की रक्षा करता है.