काशी का आखिरी घाट क्यों कहलाता है अस्सी? जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कहानी
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Varanasi Asi Ghat: वाराणसी का असि घाट धर्म नगरी काशी की पहचान और इतिहास का हिस्सा है. यह प्राचीन शहर उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर बसा है, जहां 84 से ज्यादा घाट अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं. इनमें से एक खास घाट है असि घाट, जिसे आम बोलचाल में अस्सी घाट के नाम से जाना जाता है. यह घाट न केवल धार्मिक गतिविधियों के लिए बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन केंद्र के रूप में भी महत्वपूर्ण है.
धार्मिक दृष्टि से असि घाट का अपना धार्मिक महत्व है. काशी में यह जगह संगम स्थल है. यहां असि और गंगा नदी का संगम हुआ है. धार्मिक मान्यता है की इस घाट पर स्नान से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है.

कथाओं के अनुसार, आदि शक्ति मां दुर्गा ने शुम्भ निशंभु से युद्ध के बाद अपनी तलवार को इसी जगह फेंका था. तलवार की धार जिस जगह गिरी वहां से जल धारा का उद्भव हुआ. यही जल धारा असि नदी के तौर पर जानी जाती है.

प्राचीन समय में असि घाट काशी का आखरी घाट था. लेकिन, वर्तमान समय में इसके आगे भी पक्के घाट है. इस घाट पर पूरे दिन घण्टा घड़ियाल और वेदमंत्रों की आवाज सुनाई देती है. सुबह सवेरे स्नान के बाद लोग यहां दान पुण्य और श्राद्ध करते है.
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असि घाट के तीर्थ पुरोहित बलराम मिश्रा ने बताया कि असि घाट काशी के प्राचीन घाटों में से एक है. यहां शाम की आरती भी काफी मशहूर है. हर रोज 7 अर्चक इस घाट पर नित्य गंगा आरती करतें है. हालांकि इस घाट पर सुबह के समय भी भव्य आरती होती है.

इस आरती को देखने के लिए देशभर से हजारों श्रद्धालु यहां आते है. हालांकि सुबह के वक्त भी गंगा स्नान और पूजन के लिए यहां भक्तों की भीड़ होती है. अध्यात्म के साथ असि घाट पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होतें है.

सुबह की शुरुआत यहां संगीत से होती है. एक निजी संस्था की ओर से यहां सुबह-ए-बनारस नाम से कार्यक्रम कराया जाता है. जिसमें हवन और संगीत के साथ योग साधना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.

हालांकि शाम के समय असि घाट पर पर्यटक और युवाओं की खासी भीड़ होती है. वर्तमान समय में यह जगह पर्यटन का प्रमुख केंद्र भी है. इस जगह पर लोग बनारसी व्यंजन का स्वाद चखने के लिए भी यहां आतें है.