काशी का लोलार्क कुंड: स्नान मात्र से संतान की कामना पूरी, जानें ऐतिहासिक रहस्य

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काशी का लोलार्क कुंड: स्नान मात्र से संतान की कामना पूरी, जानें ऐतिहासिक रहस्य


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काशी के अस्सी घाट के पास लोलार्क कुंड एक ऐसा प्राचीन स्थल है, जहां स्नान मात्र से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी मानी जाती है. लोलार्क छठ और हर षष्ठी तिथि पर यहां देशभर के श्रद्धालु हाथ पकड़कर डुबकी लगाते हैं और भगवान सूर्य से आशीर्वाद मांगते हैं.

काशी के अस्सी घाट के करीब भदैनी मुहल्ले में एक प्राचीन लोलार्क कुंड है. यह कुंड आम कुंड से बिल्कुल अलग है. इस कुंड में स्नान मात्र से ही माताओं की सुनी गोद भर जाती है. इसके लिए विशेष तिथि तय है.

अलग अलग राज्यो से आते है श्रद्धालु

वैसे तो लोलार्क छठ के दिन यहां देश के अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालु संतान प्राप्ति की कामना लेकर यहां आते हैं. यहां आकर शादी-शुदा दंपति एक साथ हाथ पकड़कर इस कुंड में तीन बार डुबकी लगाते है. फिर भगवान सूर्य से संतान प्राप्ति की कामना करतें है.

मन्नत पूरी होने पर आते हैं श्रद्धालु

इस दौरान एक फल कुंड में अर्पित किया जाता है. फिर मनोकामना की पूर्ति तक इस फल का सेवन दंपति नहीं करतें है. मनोकामना पूर्ति के बाद मुंडन के लिए लोग यहां आते है और कुंड पर ऊपरी हिस्से पर बसे लोलाकेश्वर महादेव का दर्शन करतें है.

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60 फीसदी केस में सफलता

इस कुंड पर रिसर्च करने वाले बीएचयू के प्रोफेसर प्रवीण सिंह राणा ने बताया कि लोलार्क छठ के दिन यहां विशेष उर्जा का संचार होता है. एक रिसर्च में सामने आया है कि यहां इस दिन स्नान से कई दंपतियों की सन्तान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण हुई है. 60 फीसदी केस में ऐसा देखा गया है.

भगवान सूर्य से है कनेक्शन

काशी के इस ऐतिहासिक कुंड का नाता भगवान सूर्य से है. कथाओं के मुताबिक, इसी जगह भगवान सूर्य का रथ भी गिरा था. उनके रथ के पहिये से ही इस कुंड का निर्माण हुआ था. इस जगह स्नान से चर्म और कुष्ठ रोग भी दूर होते है.

इस दिन भी होता है स्नान

सिर्फ लोलार्क छठ नहीं बल्कि हर महीने की षष्ठी तिथि को यहां स्नान का विशेष फल मिलता है. क्योंकि षष्ठी तिथि भगवान सूर्य को समर्पित होता है.

रानी अहिल्याबाई ने कराया था निर्माण

लोलार्क कुंड चौथी शताब्दी के दौरान गुप्तकाल में बनाया गया लगता है. लेकिन,10 वीं शताब्दी में गढ़वाल वंश के राजा गोविंद चंद ने इस कुंड का दोबारा निर्माण कराया. इसी के बाद से देश भर के लोगों को इस कुंड से मिलने वाले फायदे के बारे में जानकारी मिली.

उल्टा पिरामिड जैसा है स्वरूप

बाद में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इस कुंड का पुननिर्माण कराया. जिसके बाद से आज तक यह कुंड उसी स्ट्रचर का है. उल्टे पिरामिड जैसे आकार वाला यह कुंड करीब 50 फीट गहरा और 15 फीट चौड़ा है.



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