किसान भाई सरसों के इस वैरायटी की करें खेती, बंपर होगा पैदावार,
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कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरपाल सिंह ने कहा कि सरसों की बुवाई के लिए अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से लेकर नवंबर के पहले सप्ताह तक का समय सबसे बेहतर रहता है. बहुत देर से बुवाई करने पर फसल की उपज कम हो जाती है. प्रति हेक्टेयर 4 से 5 किलो बीज ही पर्याप्त होता है.
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के किसान भाइयों के लिए सरसों की खेती इस सीजन में फायदे का सौदा साबित हो सकती है. अगर किसान सही वैरायटी (बीज किस्म) का चुनाव करें. उन्हें कम समय में बंपर पैदावार मिल सकती है.
दीनदयाल शोध संस्थान कृषि विज्ञान केंद्र गोपाल ग्राम के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरपाल सिंह बताते हैं कि गोंडा और आसपास के इलाकों में निम्न किस्में अच्छी पैदावार देती हैं, रुक्मणी, पीयूएसए 32 NDR 8501, गिरिराज यह सरसों की सभी प्रजातियां गोंडा के किसान भाइयों के लिए काफी अच्छी है. गोंडा की किसान भाई इस पर जातियों की सरसों की बुवाई करके उत्पादन में भी बढ़ोतरी होगी.
खेत की तैयारी
डॉ. हरपाल सिंह ने बताया कि सभी वैरायटी 115 से 125 दिनों में तैयार हो जाती हैं. एक हेक्टेयर खेत में इनसे करीब 20 से 22 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है. इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये रोग प्रतिरोधक हैं. कम सिंचाई में भी अच्छी फसल देती हैं. इससे किसानों की लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है. सरसों की अच्छी पैदावार के लिए खेत की तैयारी बहुत जरूरी है. इसके लिए खेत की जुताई 2 से 3 बार करें और मिट्टी को भुरभुरा बना लें. जुताई के बाद खेत में समतल पाटा चला लें ताकि बीज समान रूप से अंकुरित हो सके.
बुवाई का सही समय और बीज की मात्रा
डॉ. हरपाल सिंह ने बताया कि सरसों की बुवाई के लिए अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से लेकर नवंबर के पहले सप्ताह तक का समय सबसे बेहतर रहता है. बहुत देर से बुवाई करने पर फसल की उपज कम हो जाती है. प्रति हेक्टेयर 4 से 5 किलो बीज ही पर्याप्त होता है. बीजों को बुवाई से पहले फफूंदनाशी दवा से उपचारित कर लेना चाहिए ताकि फसल में रोग न लगें.
सिंचाई और देखभाल
डॉ. हरपाल सिंह के अनुसार सरसों की फसल में नमी बनाए रखना जरूरी है. इसलिए खेत की स्थिति देखकर पहली सिंचाई फूल आने से पहले और दूसरी सिंचाई दाने भरने के समय करनी चाहिए. जलभराव से बचाव जरूरी है, क्योंकि सरसों की फसल में पानी ठहरने से नुकसान हो सकता है.
कीट और रोग से बचाव
कीटों से फसल की रक्षा के लिए रासायनिक दवाओं की जगह नीम आधारित जैव कीटनाशक का प्रयोग करना बेहतर होता है. इससे फसल सुरक्षित रहती है और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है. डॉ. हरपाल सिंह ने बताया कि गोंडा जिले में इन वैरायटी की खेती करने वाले किसानों को न केवल अच्छी पैदावार मिलती है, बल्कि बाजार में सरसों के दाम भी अच्छे मिल रहे हैं. अगर किसान समय पर बुवाई करें, फसल की देखभाल नियमित रूप से करें और जैविक तरीकों से उत्पादन करें, तो उन्हें 20–25 प्रतिशत अधिक लाभ हो सकता है.