क्या इस्लाम वाकई निकाह को जात और खानदान की सीमाओं में बांधता है, यहां जानिए
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इस्लाम में शादी का क़ान्सेप्ट बिल्कुल साफ़ है. इस्लाम का नज़रिया यह है कि पूरी इंसानी दुनिया को अल्लाह तआला ने एक ही मर्द और एक ही औरत से पैदा किया है.
अलीगढ़: अक्सर देखा जाता है कि लोग अपनी ही जात-बिरादरी में बेटे और बेटियों की शादी करना पसंद करते हैं, लेकिन क्या मुस्लिम समाज में शादी सचमुच अपनी ही बिरादरी और जात के दायरे में कर लेना एक मज़हबी मजबूरी है? जब लोग सैफी–सैफी, खान–खान और शेरवानी–शेरवानी में ही रिश्ते तय करते हैं, तो क्या यह इस्लाम की कोई शर्त है या सिर्फ़ समाज की बनाई हुई परंपरा? क्या इस्लाम वाकई निकाह को जात और खानदान की सीमाओं में बाँधता है या फिर यह सोच सदियों से चली आ रही लोगों की महज़ आदत है. इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए लोकल 18 ने मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन से खास बात की.
क्या है इस्लाम का नजरिया
जानकारी देते हुए चीफ़ मुफ़्ती ऑफ़ उत्तर प्रदेश मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने बताया कि इस्लाम में शादी का क़ान्सेप्ट बिल्कुल साफ़ है. इस्लाम का नज़रिया यह है कि पूरी इंसानी दुनिया को अल्लाह तआला ने एक ही मर्द और एक ही औरत से पैदा किया है. जब मूल आधार ही एक है तो फिर जात, बिरादरी, खानदान या किसी तरह की ऊँच-नीच का कोई कॉन्सेप्ट इस्लाम में रह ही नहीं जाता.
कोई जात बड़ी है, न कोई छोटी
मौलाना ने कहा कि इस्लाम के मुताबिक़ न कोई जात बड़ी है, न कोई छोटी. न सैफी होने में कोई बड़प्पन है, न खान होने में कोई ख़ासियत, न शेरवानी या किसी दूसरी बिरादरी को कोई अफ़ज़लियत दी गई है. सभी इंसान बराबर हैं. हालांकि, इस्लाम में क़बीलों का ज़िक्र सिर्फ़ पहचान के लिए किया गया है, ताकि मालूम रहे कि कौन किस खानदान से है. यह पहचान किसी को छोटा-बड़ा साबित करने के लिए नहीं है और न ही शादी को किसी ख़ास बिरादरी तक सीमित करने के लिए है.
मुसलमानों में शादी दूसरे मुसलमान से जायज
मौलाना ने कहा कि मुसलमानों में शादी कहीं भी, किसी भी मुसलमान में की जा सकती है. इस्लाम ने इसमें कोई पाबंदी नहीं लगाई. आज जो लोग अपनी ही बिरादरी में शादी करना पसंद करते हैं, यह उनकी सामाजिक या परिवारिक सोच हो सकती है, लेकिन इसका इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है. इस्लाम सब मुसलमानों को बराबर का दर्जा देता है और शादी में जात-बिरादरी की कोई शर्त नहीं रखता.