बदलते मौसम ने बढ़ाई किसानों की चिंता, सरसों पर सफेद रस्ट का हमला, अपनाएं वैज्ञानिक तरीके और बचाएं फसल
शाहजहांपुर : कम लागत और कम सिंचाई में अच्छा मुनाफा देने वाली सरसों को किसान ‘पीला सोना’ कहते हैं. उत्तर भारत में यह फसल किसानों की आय का मजबूत आधार है. लेकिन शाहजहांपुर जिले में मौसम के बदलते मिजाज के कारण सरसों की फसल पर खतरनाक फंगल रोगों का खतरा बढ़ गया है. विशेषज्ञों ने समय रहते रोकथाम न करने पर भारी नुकसान की चेतावनी दी है.
किसानों की पसंद बनी सरसों की खेती
सरसों की खेती उत्तर भारत के किसानों के लिए बेहद लाभकारी मानी जाती है. खाद्य तेल की बढ़ती मांग और बाजार में अच्छे दाम मिलने के कारण किसान इसे गेहूं के विकल्प या सह फसल के रूप में उगाते हैं. यह फसल कम पानी में तैयार हो जाती है और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी मदद करती है. सरसों से निकलने वाली खली पशुओं के लिए पौष्टिक चारा होती है, जिससे पशुपालन को भी बढ़ावा मिलता है.
मौसम बदलाव से बढ़ा रोगों का प्रकोप
कृषि विज्ञान केंद्र नियामतपुर में तैनात कृषि विशेषज्ञ डॉ. हादी हुसैन खान ने बताया कि शाहजहांपुर में मौसम के बदलाव ने सरसों की फसल को खतरे में डाल दिया है. तेज हवाओं और नमी के कारण ‘सफेद रस्ट’ और ‘पाउडरी मिल्ड्यू’ जैसे रोग तेजी से फैल रहे हैं. यह दोनों रोग फंगल संक्रमण के कारण होते हैं और समय रहते नियंत्रण न होने पर फसल को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं.
हवा से तेजी से फैल रहा संक्रमण
विशेषज्ञों के अनुसार तेज हवाएं इन रोगों के स्पोर्स को एक खेत से दूसरे खेत में अपने आप फैला रही हैं. सफेद रस्ट रोग में पत्तियों के नीचे सफेद धब्बे बन जाते हैं. इससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया प्रभावित होती है और फसल का विकास रुक जाता है. अगर नमी और हवा का यही तालमेल बना रहा तो पैदावार में 60 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है.
उत्पादन पर पड़ सकता है भारी असर
सरसों की फसल पर इन रोगों का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है. संक्रमित पौधे कमजोर हो जाते हैं और दाने भरने की क्षमता कम हो जाती है. इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती लक्षण दिखते ही सतर्क हो जाना बेहद जरूरी है.
संक्रमित पौधों को हटाना जरूरी
रोग नियंत्रण के लिए सबसे पहले संक्रमित पौधों और पत्तियों को खेत से हटाना चाहिए. इन्हें खुले में फेंकने की बजाय गहरे गड्ढे में दबा दें, ताकि हवा के साथ फंगल स्पोर्स आगे न फैल सकें. इससे संक्रमण की रफ्तार को काफी हद तक रोका जा सकता है.
सिंचाई में बरतें खास सावधानी
संक्रमण की स्थिति में खेत की सिंचाई तुरंत रोक देनी चाहिए. अगर सिंचाई की जा रही हो तो ध्यान रखें कि संक्रमित खेत का पानी दूसरे खेत में न जाए. अधिक नमी फंगस के पनपने के लिए अनुकूल होती है और रोग को तेजी से बढ़ा सकती है.
रासायनिक उपचार से मिलेगी राहत
विशेषज्ञों ने बचाव के लिए मैनकोज़ेब या कार्बेन्डाज़िम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी है. वहीं पाउडरी मिल्ड्यू रोग के नियंत्रण के लिए सल्फर का प्रयोग प्रभावी माना जाता है. समय पर दवा का छिड़काव करने से फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.
समय पर कदम उठाना ही समाधान
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सरसों की फसल को सुरक्षित रखने के लिए किसानों को नियमित निगरानी करनी चाहिए. समय पर पहचान और सही उपचार से ‘पीले सोने’ की चमक बरकरार रखी जा सकती है और किसान भारी नुकसान से बच सकते हैं.