‘मिर्च की बेल’ से शुरू हुई वो कहानी जिसने बदल दी सहारनपुर की तकदीर! जानिए कैसे शुरू हुआ यहां नक्काशी का काम

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‘मिर्च की बेल’ से शुरू हुई वो कहानी जिसने बदल दी सहारनपुर की तकदीर! जानिए कैसे शुरू हुआ यहां नक्काशी का काम


सहारनपुर: यूपी का सहारनपुर जिला लकड़ी पर नक्काशी के लिए भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपनी अलग पहचान रखता है. यहां का फर्नीचर न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी बड़े शौक से खरीदा जाता है. सहारनपुर के खाता खेड़ी वुड कार्विंग फर्नीचर बाजार में 1000 से ज्यादा छोटी-बड़ी दुकानें हैं. इन दुकानों में शानदार सोफे, आकर्षक डाइनिंग टेबल, लक्जरी पलंग, सुंदर ड्रेसिंग टेबल और घर की शोभा बढ़ाने वाले कुर्सी और सेंट्रल टेबल मिलते हैं.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि लकड़ी पर नक्काशी का यह काम सहारनपुर में कैसे आया और कैसे इसकी शुरुआत हुई. सहारनपुर में लकड़ी पर नक्काशी का काम लगभग 400 साल पहले शुरू हुआ था. शुरूआत में कश्मीर के लोग अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी किया करते थे. बाद में मुल्तान से आए कुछ लोग यहां आए और उन्होंने लकड़ी पर खूबसूरत नक्काशी शुरू की. धीरे-धीरे शहर के लोगों ने इस नक्काशी को अपनाया और आज सहारनपुर लकड़ी पर नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में अलग पहचान रखता है.

सहारनपुर के हर घर में मिलती है नक्काशी
सहारनपुर के कुछ क्षेत्रों में हर घर में लकड़ी पर नक्काशी देखने को मिलती है. यह उद्योग न सिर्फ शहर की शान बढ़ाता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी अहम योगदान देता है. सालाना सहारनपुर की वुड कार्विंग लगभग 800 से 1000 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा देश में लेकर आती है. कभी यह व्यापार लकड़ी की एक कंगी से शुरू हुआ था, जो आज हजारों प्रकार के डिजाइन तैयार कर रहा है. यहां तैयार किए गए लकड़ी के फर्नीचर देशभर में छोटे से लेकर बड़े बाजारों में ऑनलाइन भी बेचे जाते हैं.

पहले अखरोट की लकड़ी में होती थी कारीगरी
साहित्यकार डॉक्टर वीरेंद्र आज़म ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि सहारनपुर में मुगलकालीन नक्काशी का इतिहास करीब 400 साल पुराना है. कश्मीर से आए कारीगर अखरोट की लकड़ी पर नक्काशी करते थे. अखरोट की लकड़ी टिडकती थी, इसलिए बाद में यह काम शीशम और अन्य लकड़ियों पर होने लगा. करीब 300 साल पहले मुल्तान से आए कुछ कारीगर लकड़ी की कंघी बनाते थे और उस पर नक्काशी करते थे जिसे मिर्च की बेल कहते थे. यह हुनर लोगों को इतना पसंद आया कि उन्होंने इस नक्काशी को अपने घरों की चौखट और दरवाजों पर भी लगवाया. आज भी पुरानी हवेलियों में यह नक्काशी देखी जा सकती है.

25 हजार इकाइयां कर रही काम
समय के साथ शहर के लोगों ने इस कला को अपनाया और नक्काशी उद्योग में विकसित किया. आज लगभग 25 हजार छोटी इकाइयां इस काम में लगी हैं. इसके अलावा 35 से 40 फर्म लकड़ी का फर्नीचर जैसे बैड, बॉक्स, अलमारी, कैंडल स्टैंड, सजावटी सामान, रहल, सोफा, पर्दे आदि बनाकर विदेशों में निर्यात कर रही हैं. यह उद्योग सहारनपुर की पुरानी मंडी, सराय शाहजी, इस्लामिया मार्ग, पुल कंबोह, झोटे वाला, नया बांस और खाता खेड़ी सहित कई क्षेत्रों में सक्रिय है.
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यदि आज की स्थिति देखें तो यह उद्योग न केवल सहारनपुर, बल्कि प्रदेश और देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच गया है. विदेशों में इसकी मांग काफी अधिक है. हालांकि पिछले कुछ सालों में बिजली संकट, सरकार की नीतियां, कोरोना महामारी और विदेशों में युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण इस व्यापार में थोड़ी कमी आई है. अन्यथा सहारनपुर का यह लकड़ी उद्योग लगभग 800 से 1000 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा देश को उपलब्ध कराता रहा है. यह न केवल शहर की पहचान बल्कि देश के निर्माण में भी अहम योगदान देता है.



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