यूपी का एक ऐसा गांव जहां 300 साल पुरानी कला बनी गांव वालों की सिर दर्द

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यूपी का एक ऐसा गांव जहां 300 साल पुरानी कला बनी गांव वालों की सिर दर्द


Agency:News18 Uttar Pradesh

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“बसुका गांव जहां 300 साल पुरानी कला अब संघर्ष और बदनामी में बदल गई”

गाजीपुर.

बसुका गांव का नाम जगदंब ऋषि के एक बेटे बसु के नाम पर पड़ा। यह गांव तवायफों की 300 साल पुरानी परंपरा के लिए जाना जाता है।गांव के निवासी विश्वनाथ यादव बताते हैं कि 300 साल पहले यहां की घुमंतू जातियां, जो भैंस चराने का काम करती थीं, धीरे-धीरे नृत्य और गायन की कला में लग गईं। उनकी जनसंख्या बढ़ती गई और वे \”नट\” जाति के रूप में पहचाने जाने लगे।
वर्तमान में यह परंपरा केवल 10% तवायफों तक सीमित रह गई है, जिनकी 3-4 पीढ़ियां इसी कला में लगी रही हैं।

कला से संघर्ष तक का सफर

कभी बसुका गांव का हर कोना मुजरे और गीत-संगीत से गूंजता था। यहां की तवायफें कला के जरिए अपनी आजीविका चलाती थीं। लेकिन अब, बदले हुए सामाजिक और आर्थिक हालातों ने इस कला को लगभग खत्म कर दिया है।

गांव के निवासी विश्वनाथ यादव बताते हैं, \”तवायफों की कला भारतीय संस्कृति का हिस्सा थी, लेकिन अब यह लगभग खत्म हो चुकी है। कला की जगह अब वेश्यावृत्ति ने ले ली है, जिससे गांव की बदनामी हो रही है।\”गांव में भूमिहारों और राजभरों की संख्या अधिक है, जबकि तवायफों का पेशा मुख्य रूप से निचली मुस्लिम जातियों से जुड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी परंपरा को बचाना जरूरी है, लेकिन वेश्यावृत्ति ने इस कला की छवि को धूमिल कर दिया है।

तवायफों का संघर्ष: कला से मजबूरी तक
लोकल 18 की टीम ने जब गांव का दौरा किया, तो तवायफों ने अपनी कहानी साझा की। नाम न बताने की शर्त पर एक तवायफ ने कहा, \”हमारी कला अब लुप्त हो रही है। लोग हमें केवल जिस्मफरोशी से जोड़ते हैं, जबकि हमारा काम नृत्य और गायन है। पेट पालने के लिए मजबूरी में हमें यह सब करना पड़ता है।\”कैलाश यादव, गांव के एक निवासी, बताते हैं कि कई तवायफ गांव छोड़ चुकी हैं। जो तवायफें यहां बसी हैं, वे समाज के साथ घुल-मिलकर रह रही हैं। उनके बच्चे स्कूल जाते हैं और अन्य बच्चों के साथ पढ़ाई करते है।

समाज और कला के बीच उलझा बसुका

बसुका के कई लोग इस बात से दुखी हैं कि गांव का नाम सुनते ही लोग यहां शादी तक करने से कतराते हैं। गांव के एक निवासी कैलाश यादव बताते हैं कि तवायफों के कुछ बच्चे अब पढ़ाई कर रहे हैं और समाज में घुल-मिल रहे हैं। लेकिन गांव के उन इलाकों में, जहां तवायफों की बस्ती है, गालियां इतनी पतली हैं कि वहां सिर्फ एक व्यक्ति ही चल सकता है।

तवायफों की नई पीढ़ी का कहना है कि कला अब उनके लिए आजीविका नहीं रही। एक तवायफ ने कहा, \”पहले हमारी कला की कद्र थी, लेकिन अब हमें पेट पालने के लिए जिस्मफरोशी करनी पड़ रही है।\”

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