यूपी के इस गांव में रंगों से नहीं खेली जाती होली, 100 सालों से निभाई जा रही अनोखी परंपरा,
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सहारनपुर से 35 किमी दूर औरंगाबाद गांव में 100 साल से अनोखी परंपरा निभाई जा रही है. यहां होली पूजन तो होता है, लेकिन दुल्हेंडी पर रंग नहीं खेले जाते. 1927 से आर्य समाज के तत्वावधान में तीन दिवसीय यज्ञ, भजन और वेद उपदेश का आयोजन होता है. ग्रामीण हवन-पूजन और धार्मिक ज्ञान के साथ पर्व मनाते हैं.
सहारनपुर: होली का पर्व जिसको भारत देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है. होली पूजन के बाद अगले दिन दुल्हेंडी का पर्व होता है. इसमें एक दूसरे को रंग लगाया जाता है, नाच गाना होता है और पकवान बनाए जाते हैं. होली का पर्व हो और रंग न लगाया जाए ऐसा हो ही नहीं सकता, लेकिन सहारनपुर का एक गांव ऐसा भी है, जहां पर होली पूजन तो होता है, लेकिन रंगों की होली यहां पर नहीं खेली जाती. सहारनपुर से महज 35 किलोमीटर की दूरी पर बसा गांव औरंगाबाद जिसमें पिछले 100 साल से यह अनोखी परंपरा चली आ रही है, जिसमें लोग दुल्हेंडी वाले दिन रंगों से नहीं बल्कि अपनी धार्मिकता से जुड़े रहते हैं.
100 सालों से चल रही परंपरा
गांव के लोग बताते हैं कि गांव में वर्ष 1927 से यह परंपरा चली आ रही है. होलिका दहन, दुल्हेंडी और इसके अगले दिन तक आर्य समाज के तत्वावधान में गांव का भ्रमण कर लोगों को उपदेश देकर वेदों का अनुसरण करने के लिए प्रेरित किया जाता है. महर्षि दयानंद सरस्वती के संदेशों को घर-घर तक पहुंचाया जाता है. साथ ही तीनों दिन तक यज्ञ होता है. इस कार्यक्रम और यज्ञ में प्रत्येक घर से भागीदारी होती है. इस दौरान भजनोपदेशक अपने भजनों व उपदेशों से लोगों को समाज में फैली कुरीतियों से बचने के लिए प्रेरित करते हैं. इतना ही नहीं गांव औरंगाबाद के साथ ही आसपास के गांवों के लोग भी इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं.
रंगों से नहीं यहां हवन यज्ञ, वेद पुराण के ज्ञान से होता है दुल्हेंडी का पर्व
ग्रामीण लाल सिंह ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि गांव में तीन दिन का जलसा होता है उन अच्छी बातों को देखकर यहां के लोग गलत दिशा में नहीं चलते. जिस तरीके से दुल्हेंडी वाले दिन लोग शराब पीकर हुड़दंग मचाते हैं, लड़ाई झगड़ा करते हैं उन सब से यहां के लोग कोसों दूर हैं. इस परंपरा को चलते हुए 100 साल हो चुके हैं और इस वर्ष भी इस परंपरा के 100 साल पूरे होने पर प्रत्येक वर्ष की भांति तीन दिवसीय जलसे का बड़ा आयोजन होगा. हमारे यह कार्यक्रम तीन दिन का होता है होली से इसकी शुरुआत हो जाती है और होली दुल्हेंडी होने के बाद तीसरे दिन इसका समापन होता है. 3 दिन के कार्यक्रम में धार्मिक ज्ञान, भजन, हवन पूजन, वेद पुराण और पुरानी संस्कृति से के बारे में बताया जाता है.
होली पर 100 साल पुरानी परंपरा आज भी बदस्तूर है जारी
ग्रामीण विकास धीमान ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि जब से हम लोगों ने होश संभाला है, तब से हम लोगों ने अपने गांव में होली, फाग और उससे अगले दिन हवन पूजन और धार्मिक ज्ञान सुना है. होली वाले दिन होली पूजन होता है और दुल्हेंडी वाले दिन सुबह के समय सब लोग अपने घरों पर पकवान बनाते हैं और पकवान खाने के बाद फिर अपने हवन पूजन में बैठ जाते हैं, यह कार्यक्रम सुबह से शाम तक चलता है. इस बीच एक दूसरे को रंग लगाने का, शराब पीना, हुड़दंग मचाना ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं होता. जलसे में धर्म की बातें बताने के साथ बच्चों को धर्म की शिक्षा दी जाती है.
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पिछले एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं. 2010 में प्रिंट मीडिया से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की, जिसके बाद यह सफर निरंतर आगे बढ़ता गया. प्रिंट, टीवी और डिजिटल-तीनों ही माध्यमों म…और पढ़ें