ये कारीगर खजूर की लकड़ी से बनाते हैं अनोखा सामान, विदेश तक है डिमांड
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Farrukhabad News: यूपी में फर्रुखाबाद के कारीगर अपनी कारीगरी के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं. यहां के कारीगरों द्वारा खजूर की लकड़ी की अनोखी चीजें बनाई जाती हैं. इसकी खूबसूरती देखकर हर कोई खरीदनना चाहता है, लेकिन ये कारीगर इस कार्य से अपने परिवार का…और पढ़ें
खजूर की टोकरिया बुनते कारीगर
फर्रुखाबाद: देश और दुनिया में फर्रुखाबाद के कारीगर अपनी कारीगरी के लिए मशहूर है. उनकी इस प्रतिभा को कई दशकों से कोई विशेष पहचान नहीं मिली है. जबकि सरकार की एक जिला के उत्पाद योजना चलाई जा रही है. इसके माध्यम से यहां के कारीगर अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ा सकते हैं. इसको लेकर के यहां पर खजूर की लकड़ियों से आकर्षक घरेलू सामाग्री बनाते हैं. जिसकी विदेशों में भी डिमांड है.
बता दें कि घर से लेकर शादी विवाह और मांगलिक कार्यों में मिष्ठान भेजने में भी प्राचीन समय से ही प्रयोग में लाई जाने वाली यह लकड़ी बहुत ही खास होती है. इसका प्रयोग सब्जियों में किया जाता है. ऐसे समय पर यह दलिया फर्रुखाबाद की पहचान बन चुकी है. यहां के कारीगर सालों यह कारोबार करते आ रहे हैं. इस कारोबार से उन्हें मुनाफा भी होता है.
जानें कारीगर ने क्या कहा
कारीगर वीरेंद्र कुमार ने लोकल 18 को बताया कि उनके हाथों की बनी सुंदर डलिया दूसरे जनपदों में भी बिक्री के लिए जाती है. आज के समय में जब प्लास्टिक का चलन बढ़ रहा है. फिर भी इनके हाथों की बनी हुई खजूर की टोकरियों की खूब डिमांड है. पहले अनेकों परिवार यह कार्य करते थे, लेकिन आज के समय में लोग अब दैनिक रूप से कम प्रयोग करते हैं. इनके इस धंधे में काफी मुश्किल आ गई है.
ब्लॉक के शेखपुर के ग्रामीण बताते हैं कि उनका यह कार्य कई पीढ़ियों से लगातार चलता आ रहा है, लेकिन समय बदलने के बाद साथ उनका भरण पोषण नहीं हो पा रहा है. दरअसल, कमालगंज क्षेत्र के कई ऐसे गांव हैं. जहां पर ग्रामीण इस लकड़ी से कारीगरी करके अपना गुजारा करते हैं, लेकिन जिस प्रकार स्थानीय बाजार में अरहल की फसल कम होती है. ऐसे में अब यहां लकड़ियां भी नहीं मिलती हैं, जिसके चलते इन कारीगरों को देश के कई जिलों में जाकर लकड़ियां खरीदनी पड़ती हैं.
परिवार का भरण-पोषण है मुश्किल
यहां के कारीगर मध्य प्रदेश, महोबा, बुंदेलखंड तक लकड़ियों को खरीदने जाते हैं. इससे उनका किराया भी अधिक पड़ जाता है. इससे उसकी लागत बढ़ जाती है. कारीगरों ने बताया कि एक डाली बनाने में 50 रुपए की लागत आती है. जबकि अधिकतम 75 रुपए में बेची जाती है. इतनी कड़ी मेहनत के बाद भी वह महीने में अधिकतम 5000 रुपए तक ही कमा पाते हैं. इतनी कम आमदनी से उनका केवल भरण पोषण ही हो पाता है.
लकड़ियों को लेकर दुकानदार ने बताया
दुकानदार ने बताया कि जिस प्रकार पहले के समय में जंगल में खजूर के पेड़ों को ढूंढते हैं. इसके बाद उसकी लकड़ियों को काटने के बाद घर पर 3 से 4 दिन तक रखते हैं. जब यह अच्छे से सूख जाती है तो इन्हें हाशिए से तरासते हैं. इसके बाद टोकरी बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है. यहां पहले आसानी से लकड़ियां मिल जाती थी, लेकिन अब यहां पर आलू और धान होने की वजह से अरहर की खेती का रकबा कम हो गया है. उन्होंने बताया कि लकड़ी सबसे अच्छी खजूर और बहेड़ा और शहतूत की मानी जाती है.
चंबल क्षेत्र से लाते हैं लकड़ियां
ऐसे समय पर अब कारीगरों को मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र से अरहर की लड़कियां लानी पड़ती हैं, जो की बहुत ही महंगी मिलती है. इसके साथ ही वहां से यहां तक का ट्रांसपोर्ट का किराया भी अधिक लगने के कारण यह व्यवसाय बहुत ही कठिन हो चुका है. ऐसे में अधिक धनराशि लगानी पड़ती है और बचत भी कम होती है, लेकिन इसके बावजूद भी वह इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं.