शादी, 4 बच्चे और फिर पति की मौत, लेकिन नहीं टूटा जौनपुर की उषा का हौंसला, अधूरे सपने को किया पूरा

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शादी, 4 बच्चे और फिर पति की मौत, लेकिन नहीं टूटा जौनपुर की उषा का हौंसला, अधूरे सपने को किया पूरा


जौनपुर: कहते हैं कि अगर हौसले मजबूत हों तो हालात रास्ता नहीं रोक पाते हैं. जौनपुर नगर के हुसेनाबाद मोहल्ले की रहने वाली डॉ. उषा सिंह की कहानी इसी कहावत को सच साबित करती है. सामाजिक बंधनों के चलते इंटरमीडिएट तक पढ़ाई पूरी होते ही उनकी सगाई और फिर शादी हो गई. दुल्हन बनकर ससुराल आने के बाद घर-परिवार की जिम्मेदारियों में ऐसा उलझीं कि पढ़ाई पीछे छूट गई. चार बच्चों की मां बनकर उन्होंने लंबे समय तक एक गृहिणी के रूप में जीवन बिताया.

शादी के लगभग दस वर्ष बाद बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए गांव छोड़कर शहर आना पड़ा. इसी दौरान पढ़ाई के प्रति उनका अधूरा सपना फिर से जाग उठा. घर, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ उन्होंने पढ़ाई शुरू की और एक के बाद एक उपलब्धियां हासिल करती चली गईं. उन्होंने बीए, एमए, बीएड, एमएड और पीएचडी तक की पढ़ाई पूरी की. इतना ही नहीं, चार अलग-अलग विषयों से स्नातकोत्तर की डिग्री भी प्राप्त की, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है.

बुनियादी शिक्षा समाज के लिए जरूरी

डॉ. उषा सिंह ने गाजीपुर के एक डिग्री कॉलेज में एक वर्ष तक संविदा पर असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं. हालांकि परिवार की देखभाल और स्थायी नौकरी की जरूरत को देखते हुए उन्होंने डिग्री कॉलेज की नौकरी छोड़कर बेसिक शिक्षा विभाग में प्राइमरी स्कूल शिक्षिका के रूप में कार्य करना बेहतर समझा. उनका मानना था कि बुनियादी शिक्षा को मजबूत करना समाज के लिए सबसे जरूरी है.

पति की कैंसर से मौत, आई परिवार की जिम्मेदारी

उनके जीवन में सबसे कठिन दौर वर्ष 2013 में आया, जब उनके पति जितेंद्र सिंह कैंसर से पीड़ित हो गए. इलाज के लिए उन्हें जौनपुर, वाराणसी, लखनऊ और मुंबई तक दौड़ लगानी पड़ी. एक ओर पति की बीमारी, दूसरी ओर बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जिम्मेदारी, इन सबके बीच उन्होंने खुद को संभाले रखा. तमाम प्रयासों के बावजूद वह अपने पति को नहीं बचा सकीं. पति के निधन के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी अकेले उनके कंधों पर आ गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.

भविष्य को संवारने में खुद को समर्पित

डॉ. उषा सिंह ने अपने दर्द को भीतर दबाकर बच्चों के भविष्य को संवारने में खुद को समर्पित कर दिया. आज उनकी बड़ी बेटी शुभ्रा सिंह बैंक मैनेजर हैं, दूसरी बेटी शिप्रा सिंह बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षिका हैं, तीसरी बेटी शिल्पा सिंह गुजरात के अहमदाबाद स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च में शोध कार्य कर रही हैं, जबकि बेटा रणवीर प्रताप सिंह यूपीएससी की तैयारी कर रहा है. दो बेटियों की शादी भी वह कर चुकी हैं. डॉ. उषा सिंह की यह कहानी न सिर्फ महिलाओं के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत है, जो यह सिखाती है कि संघर्ष कितना भी बड़ा क्यों न हो, आत्मविश्वास और मेहनत से हर मंजिल हासिल की जा सकती है.



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