शाहजहांपुर के इस किसान से सीखें खेती, जो इधर-उधर पड़ा रहता है, उससे छाप रहा नोट

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शाहजहांपुर के इस किसान से सीखें खेती, जो इधर-उधर पड़ा रहता है, उससे छाप रहा नोट


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Vermicompost benefits : शाहजहांपुर के युवा किसान ज्ञानेश तिवारी ने कमाल कर दिखाया है. उन्होंने डेयरी और वर्मी कंपोस्ट के संगम से खेती को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. 2014 में डेयरी से शुरुआत कर आज वे सालाना 1700 क्विंटल जैविक खाद का उत्पादन कर रहे हैं. आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं की मदद से उन्होंने न केवल अपनी आय बढ़ाई, बल्कि हजारों किसानों को आत्मनिर्भरता बनाने में जुटे हैं. लोकल 18 ने उनसे बात की. वे बताते हैं कि मैंने खुद को सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रखा, बल्कि केंचुआ खाद और केंचुओं की बिक्री को एक बड़े व्यवसाय में बदल दिया.

शाहजहांपुर. जब खेती को घाटे का सौदा माना जाने लगा है, उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में रहने वाले प्रगतिशील युवा किसान ज्ञानेश तिवारी इसे  बड़े मुनाफे में बदल रहे हैं. ज्ञानेश ने पारंपरिक खेती के साथ-साथ वर्मी कंपोस्ट के व्यवसाय को अपनाकर अपनी आय को कई गुना बढ़ा लिया है. 2014 में डेयरी फार्मिंग से शुरुआत करने वाले ज्ञानेश आज न केवल खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि हजारों अन्य किसानों को भी जैविक खेती और खाद बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं के सही तालमेल से उन्होंने कृषि क्षेत्र में सफलता की एक नई इबारत लिखी है.

लोकल 18 से किसान ज्ञानेश तिवारी बताते हैं कि उन्होंने 2014 में 100 पशुओं के साथ डेयरी का काम शुरू किया था. 2016 में कृषि विभाग और चीनी मिल की तकनीकी मदद से उन्होंने सिर्फ 2 पिट से वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू किया. आज उनके पास 250 से अधिक वर्मी बेड हैं, जिनसे सालाना 1500-1700 क्विंटल खाद का उत्पादन होता है. ज्ञानेश का कहना है कि मैंने खुद को सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रखा, बल्कि केंचुआ खाद और केंचुओं की बिक्री को एक बड़े व्यवसाय में बदल दिया. इससे न केवल मेरी लागत कम हुई, बल्कि आय भी दोगुनी-तिगुनी हो गई है. मेरा लक्ष्य हर किसान को आत्मनिर्भर बनाना है.

कितने रुपये क्विंटल

ज्ञानेश तिवारी की सफलता की कहानी डेयरी फार्मिंग से शुरू हुई. पशुओं के गोबर का सही उपयोग करने के लिए उन्होंने वर्मी कंपोस्ट बनाने का फैसला किया. शुरुआत में उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे आधुनिक तकनीक HDPE, पिट मेथड और विंड्रो मेथड से गोबर को खाद में बदला. आज उनकी खाद 800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिकती है. पिछले वर्ष उन्होंने करीब 6.5 टन केंचुए भी सप्लाई किए, जो उनकी कमाई का एक बड़ा जरिया बना.

फसल में सुधार

जैविक खाद के उपयोग से ज्ञानेश ने अपनी खेती की लागत में भारी कमी की है. रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ी है और फसल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है. ज्ञानेश न केवल खाद बेचते हैं, बल्कि अन्य किसानों के खेतों पर वर्मी कंपोस्ट यूनिट्स भी स्थापित करवाते हैं. वे सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से किसानों में जागरूकता फैला रहे हैं, ताकि किसान खाद खरीदने के बजाय खुद इसका उत्पादन कर सकें और अपनी आय बढ़ा सकें.

सरकार से बड़ी मदद

ज्ञानेश तिवारी की सफलता में सरकारी योजनाओं और तकनीकी विशेषज्ञों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. कृषि विभाग के एक्सपर्ट की मदद से उन्होंने नई तकनीकों को सीखा. उनका मानना है कि अगर कोई भी किसान 2 या 4 पशुओं के साथ भी वर्मी कंपोस्ट का काम शुरू करे, तो वह बिना किसी बिचौलिए के सीधे सरकारी लाभ ले सकता है. सही जानकारी और कड़ी मेहनत से खेती को वास्तव में एक लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है.

About the Author

Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें



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