सहारनपुर की वुड कार्विंग नक्काशी! शिवालिक की गोद से उठी कला, जिसने दुनिया में गढ़ी अपनी पहचान

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सहारनपुर की वुड कार्विंग नक्काशी! शिवालिक की गोद से उठी कला, जिसने दुनिया में गढ़ी अपनी पहचान


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Wood Carving Art of Saharanpur: भारत की सांस्कृतिक धरोहरों में अगर किसी कला ने लकड़ी में जान फूंक दी है, तो वह है सहारनपुर की वुड कार्विंग कला. शिवालिक पर्वतमाला की गोद में बसे इस जिले के कारीगरों ने अपनी नक्काशी से न केवल लकड़ी को सुंदर रूप दिया, बल्कि भारत की पारंपरिक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है.

ब्रिटिश काल में सहारनपुर जिले में रुड़की, हरिद्वार और देहरादून का क्षेत्र भी शामिल था. उस समय जिले में वन क्षेत्र 1,88,433 एकड़ था. वर्ष 1878 में सहारनपुर वन क्षेत्र को चार भागों सहारनपुर रेंज, मोहंड, बड़कलां, होलखंड और रानीपुर में बांट दिया गया.

लकड़ी के उद्योग को विकसित करने में ब्रिटिश सरकार की अहम भूमिका रही. 1878 और 1908 में तैयार किए गए गजेटियर में सहारनपुर के इस उद्योग की प्रमुखता दर्ज की गई है. 1862 में यहां के वन क्षेत्र से अंग्रेज सरकार को 7,168 रुपये की आय होती थी, जो 1869 तक बढ़कर 8,499 रुपये हो गई. 1886 से 1895 के बीच औसत वार्षिक आय 39,672 रुपये रही, जबकि खर्च 26,170 रुपये था. यानी अंग्रेज सरकार को हर साल लगभग 13,500 रुपये का लाभ होता था. यहां से लकड़ी यूरोपीय देशों में इमारत निर्माण के लिए भेजी जाती थी.

आज भी सहारनपुर के वुड कार्विंग उत्पादों का निर्यात अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूनाइटेड किंगडम, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, दुबई, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, रूस और यूक्रेन जैसे देशों में किया जाता है.

शिवालिक पर्वतमाला में स्थित सहारनपुर भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र रहा है. गंगा-यमुना के दोआब में बसे इस जिले की पहचान हमेशा अपने वन क्षेत्र और लकड़ी उद्योग के कारण बनी रही है. सहारनपुर के वुड कार्विंग उद्योग की धमक आज भारत ही नहीं बल्कि यूरोपीय देशों तक सुनाई देती है.

सहारनपुर के वुड कार्विंग कारोबारी रमजी सुजैन के अनुसार, जिले में करीब ढाई हजार से अधिक छोटी-बड़ी इकाइयां कार्यरत हैं, जहां एक लाख से अधिक कारीगर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। वर्तमान में सहारनपुर का यह उद्योग लगभग 1,400 से 1,500 करोड़ रुपये वार्षिक कारोबार कर रहा है, जिसमें से 60 प्रतिशत से अधिक व्यापार विदेशों से होता है.

वर्तमान समय में सहारनपुर अपने वुड कार्विंग उद्योग के लिए देश-विदेश में ख्याति प्राप्त कर रहा है. जिले से बड़े पैमाने पर वुड कार्विंग फर्नीचर विदेशों में निर्यात किया जा रहा है, हालांकि यह कोई नया उद्योग नहीं है. करीब 200 साल पहले भी सहारनपुर से लकड़ी का व्यापार बड़े पैमाने पर होता था. ब्रिटिश शासनकाल में यहां से इमारती लकड़ी का निर्यात किया जाता था, जिससे अंग्रेजी हुकूमत को अच्छी आमदनी होती थी.

शिवालिक की गोद में बसे सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी अब भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों तक पहुंच चुकी है. यहां के कारीगरों के हुनर से न सिर्फ लाखों लोगों को रोजगार मिला है, बल्कि भारत की कला को नई पहचान भी.

सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही. यहां के हुनरमंद कारीगरों के बनाए फर्नीचर और सजावटी उत्पाद यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों तक अपनी पहचान बना चुके हैं. करीब दो सौ साल पुरानी इस परंपरा की जड़ें ब्रिटिश शासनकाल में पड़ी थीं, जब यहां से इमारती लकड़ी का निर्यात किया जाता था. आज यह उद्योग एक लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है और सहारनपुर की कला पूरी दुनिया में भारत की पहचान के रूप में चमक रही है.

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सहारनपुर की वुड कार्विंग नक्काशी! शिवालिक की गोद से उठी कला



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