अब नहीं बर्बाद होगी फसल! इस नई तकनीक से पहले ही मिलेगी आपदा की सटीक जानकारी
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फिरोजाबाद जिले में किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान के सटीक आंकलन के लिए हर ग्राम पंचायत में ऑटोमेटिक रेन गेज और वेदर स्टेशन लगाए जाएंगे, जिससे मौसम की सही जानकारी और मुआवजा सुनिश्चित हो सकेगा.
ऑटोमेटिक रेन गेज
धीर राजपूत/ फिरोजाबाद- उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में किसानों को प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान और उसके सटीक आंकलन के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. जिले की सभी ग्राम पंचायतों में ऑटोमेटिक रेन गेज (Automatic Rain Gauge) स्थापित किए जाएंगे. इससे किसानों और ग्रामीणों को तापमान, हवा की गति और बारिश के अनुमान की सटीक जानकारी मिल सकेगी.
अब तक, मौसम की सही जानकारी के अभाव में किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था. साथ ही, उनकी फसल खराब होने की रिपोर्ट तहसील और जिला स्तर से तैयार होती थी, लेकिन अक्सर सही आंकलन न होने के कारण उन्हें नुकसान का पूरा मुआवजा नहीं मिल पाता था. इस नई तकनीक के आने से किसानों को बड़ा फायदा मिलेगा और वे प्राकृतिक आपदाओं के लिए बेहतर तैयारी कर सकेंगे.
नारखी और अरांव ब्लॉक में बनेगा ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन
फिरोजाबाद के उप कृषि निदेशक एसपी सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत फसल के नुकसान का आंकलन ग्राम पंचायत इकाई के रूप में किया जाता है. लेकिन रिपोर्ट में कमी के चलते किसानों को पूरा मुआवजा नहीं मिल पाता. इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने हर ग्राम पंचायत में ऑटोमेटिक रेन गेज स्थापित कराने का निर्णय लिया है.
नारखी और अरांव ब्लॉक में आधुनिक तकनीक से युक्त ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन स्थापित किए जाएंगे. इनमें टिपिंग बकेट रेन गेज सेंसर भी लगाया जाएगा, जो वर्षा की निगरानी के लिए सर्वश्रेष्ठ उपकरण माना जाता है. इसके जरिए रडार और रिमोट सेंसिंग डेटा का विश्लेषण, सत्यापन और डाउनस्केलिंग आसानी से किया जा सकेगा. इस व्यवस्था से तेज़ हवा, भारी वर्षा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की पूर्व जानकारी मिलना संभव होगा.
पंचायत सहायक निभाएंगे महत्वपूर्ण भूमिका
जिले की सभी ग्राम पंचायतों में लगने वाले इन ऑटोमेटिक रेन गेज स्टेशनों की जिम्मेदारी स्काईमेट वेदर सर्विस कंपनी को सौंपी गई है. कंपनी ने स्टेशन स्थापित करने के लिए सर्वे का काम शुरू कर दिया है.
इन वेदर स्टेशनों की देखरेख की ज़िम्मेदारी पंचायत सहायक निभाएंगे और उन्हें इसका पूरा रिकॉर्ड रखना होगा. इससे न केवल आंकड़ों की सटीकता बनी रहेगी बल्कि भविष्य में भी किसानों को मौसम की बेहतर जानकारी समय पर मिल सकेगी.