असल में यही जली थी असली होलिका, था हिरण्यकश्यप का महल, 5 हजार साल बाद दिखता है ऐसा
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रंगों का पर्व होली अब आ चुका है. लोगों की तैयारी लगभग पूरी हो गई है. लेकिन क्या आपको पता है कि होली की शुरुआत कहां से और कब हुई थी?
होलिका दहन की शुरुआत इसी महल से हुई थी (इमेज- फाइल फोटो)
रंगों का पर्व होली अब आ चुका है. लोगों की तैयारी लगभग पूरी हो गई है. लेकिन क्या आपको पता है कि होली की शुरुआत कहां से और कब हुई थी? अगर नहीं जानते तो आइए हम आपको बताते हैं. पहले की हरिद्रोही और आज की हरदोई से है होली का विशेष नाता है. आज भी यहां वो जगह मौजूद है, जहां होलिका की गोद में प्रह्लाद बैठे थे और होलिका अग्नि में भस्म हो गई थी.
भक्त प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप का टीले में तब्दील महल और भगवान नरसिंह अवतार सहित होलिका दहन के सबूत आज भी यहां मौजूद है. यहीं से हुई थी होलिका दहन की शुरुआत जहां अपने भाई हिरण्यकश्यप के आदेश पर अपने भतीजे भक्त प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर मारने की नियत से होलिका जलती आग में बैठी थी. लेकिन ईश्वर के अनन्य भक्त प्रहलाद तो उस आग में नहीं जले लेकिन उनको जलाने की कोशिश करने वाली उनकी बुआ होलिका जलकर राख हो गई. इसी राख से भक्त प्रहलाद ने सबसे पहले होली खेली थी. तभी से होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई थी.
ऐसी है कहानी
होली की शुरुआत हरदोई शहर से हुई थी. यहां करीब 5000 साल से भी पुराना नृसिंह भगवान मंदिर, प्रहलाद घाट, हिरण्यकश्यप के महल का खंडहर आज भी इसकी गवाही देता है. पुराणों में वर्णन है कि हिरण्यकश्यप भगवान को अपना शत्रु मानता था. हरदोई जिले का पुराना नाम हरिद्रोही था क्योंकि यह हिरण्यकश्यप की राजधानी थी. पौराणिक कथाओं के अनुसार हिरण्यकश्यप ने भगवान विष्णु के अनन्य भक्त और अपने पुत्र प्रह्लाद के खिलाफ कई जुल्म किए थे. बदला लेने के लिए उसने कई साजिशें रचीं थीं लेकिन हिरण्यकश्यप के बेटे प्रहलाद ने भगवान विष्णु की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया था. यही बात उसके पिता को बिल्कुल पसंद नहीं थी. हिरण्यकश्यप ने कई बार प्रहलाद को मारने की कोशिश की लेकिन भगवान की कृपा से वह हर बार बच जाता था. जब उसके सभी उपाय फेल हो गए तो एक दिन हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से प्रहलाद को मारने के लिए कहा. होलिका को भगवान से वरदान प्राप्त था. जब वह आग में बैठती थी तो जलती नहीं थी. होलिका प्रहलाद को अपनी गोदी में लेकर आग में बैठ गयी लेकिन भगवान विष्णु की माया के अनुसार, होलिका जलकर भस्म हो गई जबकि प्रहलाद बच गया. हरदोई के लोग इस घटना के बाद बहुत खुश हुए और उस जली हुई चिता की राख को उड़ाया और एक-दूसरे को लगाकर खुशी मनाई. तभी से होली का त्योहार मनाने की परंपरा शुरू हो गई.
नहीं करते र का उच्चारण
हरदोई में भगवान ने एक बार बावन अवतार लिया था. हिरण्यकश्यप ने हरदोई में र अक्षर के उच्चारण पर भी रोक लगा दी थी. हिरण्यकश्यप के र शब्द के उच्चारण पर रोक लगाने का प्रभाव आज भी यहां के लोगों की जुबान पर साफ देखने को मिलता है. यहां के बुजुर्ग आज भी हरदोई को हद्दोई, मिर्चा को मिच्चा से उच्चारित करते हैं, यानी अनुवांशिक तरीके से कई स्थानों पर र शब्द बोलचाल की भाषा मे निकलता ही नही है. हरदोई में आज भी हिरण्यकश्यप के महल के खंडहर और प्रहलाद घाट मौजूद हैं, जो इस ऐतिहासिक घटना के साक्षी है. होली की शुरुआत हरदोई से होने की बात धार्मिक ग्रंथों और हरदोई गजेटियर में भी उल्लेखित है. हालांकि नगर पालिका की उपेक्षा के कारण प्रह्लाद घाट कुंड दुर्दशा का शिकार हो गया है.
March 13, 2025, 15:49 IST