कव्वाली और मुशायरे में क्या होता है अंतर? तीन पीढ़ियों की अदबी विरासत रखने वाले AMU प्रोफेसर ने बताया फर्क
अलीगढ़: उर्दू अदब की दुनिया में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनकी पहचान सिर्फ उनकी तालीम या ओहदे से नहीं, बल्कि उनके कलम की खुशबू से होती है. एएमयू के शोबा-ए-उर्दू के असिस्टेंट प्रोफेसर आफताब आलम नजमी भी उन्हीं चंद नामों में से एक हैं, जिनकी रगों में शायरी सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि विरासत की तरह उतरती आई है. नाना, वालदा और अब आफताब साहब तीन पीढ़ियों से चलती यह अदबी रौशन-परंपरा आज भी उतनी ही जिंदा है जितनी कभी पुराने मंथली जर्नल्स और बच्चों की मैगजीन के दौर में हुआ करती थी.
शायरी, नज्म और बोल्ड रियलिस्टिक कहानियों के लिए मशहूर आफताब आलम नजमी न सिर्फ अदब की नई जमीन तैयार कर रहे हैं, बल्कि कव्वाली और मुशायरे की तहजीबी हकीकत को भी बेहद खूबसूरती से समझाते हैं. उन्होंने बताया कि शायरी और अफसाना-निगारी का जो शौक उन्हें हासिल हुआ, वह उनके खानदानी विरासत का तीसरा सिलसिला है. उनके नाना शायर और अफसाना-निगार थे. उनकी वालदा भी बेहतरीन शायरा रहीं, जिन्होंने शायरी के साथ बच्चों के अदब पर कई अहम नॉवेल और कहानियां लिखीं, जो उस दौर के मंथली जर्नल्स और बच्चों की मैगजीन में छपा करती थीं.
आफताब आलम के अनुसार, इसी माहौल ने बचपन से ही उन्हें लिखने की तरफ मुतवज्जा किया. सात साल की उम्र में उनकी टूटी-फूटी जबान में लिखी शायरी और छोटी कहानियां जब लोगों तक पहुंचीं तो उन्हें हौसला मिला. इसके बाद बाकायदा लिखना शुरू किया और धीरे-धीरे एक पहचान कायम हुई खासतौर पर गीत, नज़्में और बोल्ड-डार्क रियलिटीज पर आधारित कहानियों के लिए. उन्होंने कहा कि समाज के वे मसाइल, जिन पर लोग लिखने से झिझकते हैं, उन्हें बेबाकी से बयान करना हमेशा उनकी कोशिश रही.
कव्वाली पर बात करते हुए आफताब आलम नजमी ने बताया कि ‘कव्वाली’ अरबी के लफ़्ज ‘कौल’ से निकला है, जिसका मतलब होता है, कहना या बयान करना. कव्वाली का असल मायना है किसी जुमले को सुरों के साथ बार-बार दोहराना. जब आप कव्वाली सुनते हैं, तो एक ही तर्ज़ और जुमला कई बार दोहराया जाता है. कव्वाली का चलन अमीर खुसरो के जमाने से माना जाता है. चिश्ती सिलसिले में महफ़िल-ए-समा का रिवाज रहा, जहां इश्क-ए-इलाही को बयान करने वाली धुनें और कलाम पेश किए जाते थे.
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह जैसे बड़े सूफिया का भी इससे गहरा लगाव रहा. कव्वाली हमेशा मौसिकी, सुर और कई आवाज़ों के संग पेश की जाने वाली एक जिंदा रिवायत रही है.
कव्वाली और मुशायरे का फर्क
आफताब आलम बताते हैं कि कव्वाली शायरी पेश करने का संगीतमय तरीका है, जबकि मुशायरा शायरी पढ़ने की महफ़िल होती है. मुशायरे में गजलें और नज़्में गाई नहीं जातीं, बल्कि लहजे में पढ़ी जाती हैं. इसमें साज़, राग, हारमोनियम या तालियों की रिदम नहीं होती. जबकि, कव्वाली के लिए अलग स्टेज, साज़िंदे, क़व्वाल और कोरस की जरूरत होती है. मुशायरे में शायर तर्ज़ से आज़ाद होते हैं, वहां कलाम की प्रस्तुति सबसे अहम होती है. कहीं-कहीं दोनों हो सकते हैं, मगर दोनों की सनअत, अंदाज और मकसद बिल्कुल अलग हैं.