कैसे पता चले कि आपका रोजा कबूल हुआ या नहीं? जानिए क्या कहते हैं मौलाना
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रमज़ान का मुबारक महीना चल रहा है और यह महीना हर मुसलमान के लिए अल्लाह की इबादत, रहमत और मगफिरत का महीना होता है. इस महीने में रोजा रखना, पांच वक्त की नमाज अदा करना, कुरआन-ए-पाक की तिलावत करना और नेकी के कामों म…और पढ़ें
कैसे पता चले कि आपका रोजा कबूल हुआ या नहीं? जानिए क्या कहते हैँ मौलाना
अलीगढ़: रमज़ान का मुबारक महीना चल रहा है और यह महीना हर मुसलमान के लिए अल्लाह की इबादत, रहमत और मगफिरत का महीना होता है. इस महीने में रोजा रखना, पांच वक्त की नमाज अदा करना, कुरआन-ए-पाक की तिलावत करना और नेकी के कामों में आगे बढ़ना मुसलमानों का मकसद होता है. लेकिन रोजा रखने के बाद अक्सर लोगों के दिल में यह सवाल उठता है कि क्या उनका रोजा अल्लाह ने कबूल कर लिया है या नहीं? यह सवाल काफी अहम है, क्योंकि रोजे का असली मकसद अल्लाह की रज़ा और मगफिरत को हासिल करना होता है.
रोजा कबूल होने की निशानियां
जानकारी देते हुए मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन बताते हैं कि रोजे की कबूलियत का असल फैसला अल्लाह तआला खुद फरमाते हैं. मगर इंसान के लिए यह समझना जरूरी है कि कुछ निशानियां ऐसी होती हैं जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि रोजा कबूल हुआ या नहीं. सबसे पहली निशानी यह होती है कि इंसान के अंदर इबादत का जज़्बा रमज़ान के बाद भी बना रहे. अगर रोजे के बाद भी इंसान पांच वक्त की नमाज पढ़े, झूठ, ग़ीबत, चुगली और गुस्से से बचे और नेक काम करने में दिलचस्पी रखे तो यह इस बात का इशारा है कि उसका रोजा कबूल हो गया और अगर कोई रोज़ा रख कर अल्लाह के बताये रास्ते पर नहीं चलता तो समझ लो कि उसने भूखे रह कर सिर्फ फाका किया है और कुछ नहीं.
मौलाना इफराहीम हुसैन ने बताया कि दूसरी बड़ी निशानी यह है कि रमज़ान के महीने में इंसान के अंदर विनम्रता, सब्र और सहनशीलता का जज़्बा आ जाए. अगर इंसान रमज़ान के दौरान अपनी गलत आदतों से दूर रहा और रमज़ान के बाद भी इन्हें दोहराने से परहेज करने लगा, तो समझ लीजिए कि अल्लाह ने उसके रोजे को अपनी बारगाह में कबूल कर लिया है.
मौलाना ने कहा कि इसके अलावा रोजे की एक और पहचान यह है कि इंसान के दिल में गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों की मदद का जज़्बा पैदा हो. अगर रमज़ान के बाद भी वह जरूरतमंदों की मदद करता रहे. भूखों को खाना खिलाए, और समाज के कमजोर लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करे. तो यह इस बात का मजबूत संकेत है कि अल्लाह ने उसके रोजे को कबूल फरमा लिया है.
रोजे के दौरान नीयत होनी चाहिए
हालांकि, यह भी याद रखना जरूरी है कि रोजे की असली कबूलियत का इल्म सिर्फ अल्लाह के पास होता है. इंसान का काम सिर्फ अपनी नीयत को साफ रखना, रोजे के मकसद को समझते हुए इबादत करना और अल्लाह की रज़ा के लिए अपने गुनाहों से तौबा करना है. अगर इंसान सच्चे दिल से रोजा रखे, इबादत करे और अल्लाह से माफी मांगे तो यकीनन अल्लाह उसकी इबादत को कबूल फरमाएगा.
इबादत में सच्चाई होना जरूरी
अल्लाह के नबी हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी फरमाया है कि अल्लाह अपने बंदे की नीयत और दिल की सफाई को देखता है. अगर इंसान अपनी नीयत में खोट नहीं रखता, रोजा सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए रखता है और उसकी इबादत में सच्चाई होती है, तो यकीनन अल्लाह उसके रोजे को कबूल फरमा लेता है. इसलिए, हमें अपने रोजों की फिक्र करने के बजाय अपनी नीयत और अमल को सही करने पर ध्यान देना चाहिए. अगर हमारी नीयत पाक रही और अमल नेक रहे तो अल्लाह तआला हमारे रोजों को कबूल करेगा और हमें अपनी रहमतों से नवाजेगा.
Aligarh,Aligarh,Uttar Pradesh
March 12, 2025, 12:15 IST