कौशांबी: पाइप बिछ गए पर नल में जल नहीं, 10 साल से बूंद-बूंद को तरस रहे ग्रामीण

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कौशांबी: पाइप बिछ गए पर नल में जल नहीं, 10 साल से बूंद-बूंद को तरस रहे ग्रामीण


Kaushambi Water Crisis: सरकार का वादा था कि हर घर की रसोई तक पाइप से पानी पहुंचेगा, लेकिन उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले की सिराथू तहसील में इस वादे की तस्वीर बिल्कुल अलग है. उदहीन बुजुर्ग गांव की गलियों में बिछी पानी की पाइपें अब गांव वालों को चिढ़ा रही हैं. पाइप तो दरवाजे तक आ गए, लेकिन उनमें पानी कब आएगा, इसका जवाब किसी साहब के पास नहीं है. आलम यह है कि 21वीं सदी के डिजिटल इंडिया में यहां की महिलाएं आज भी सिर पर मटका रखे 100 मीटर दूर, दूसरे के सबमर्सिबल पर लाइन लगाने को मजबूर हैं.

10 साल का सूखा और अधूरी उम्मीदें
कौशांबी जिले का उदहीन बुजुर्ग समेत दर्जनों गांव पिछले एक दशक से पानी की भारी किल्लत से जूझ रहा है. स्थानीय ग्रामीणों के लिए सुबह की पहली किरण उम्मीद नहीं, बल्कि पानी के इंतजाम की चिंता लेकर आती है. वैसे तो सरकार ‘हर घर नल योजना’ के जरिए घर-घर पानी पहुंचाने का दावा कर रही है, लेकिन इस गांव में हकीकत इसके उलट है. गांव में पाइप लाइन बिछाए हुए दो से तीन साल बीत चुके हैं, लेकिन नल की टोंटियां आज भी सूखी पड़ी हैं. कारण? पानी की टंकी का निर्माण अभी भी अधूरा है.

सबमर्सिबल पर ‘कतार’, पड़ोसियों से ‘तकरार’
जब सरकारी सिस्टम फेल होता है, तो लोग निजी संसाधनों के भरोसे टिकते हैं. उदहीन बुजुर्ग गांव में भी यही हो रहा है. गांव के जिन इक्का-दुक्का संपन्न लोगों के पास निजी सबमर्सिबल है, पूरा गांव वहीं उमड़ पड़ता है. ग्रामीण सुनील कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि उनके निजी सबमर्सिबल पर रोजाना 25 से 30 घरों के लोग पानी भरने आते हैं. सुबह होते ही वहां मेला लग जाता है. भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि पानी भरने के चक्कर में अक्सर ग्रामीणों के बीच नोक-झोंक और कहासुनी हो जाती है. हर कोई अपना नंबर पहले आने की होड़ में लगा रहता है.

बिजली की आंख-मिचौली ने बढ़ाई मुश्किल
समस्या सिर्फ पानी की टंकी अधूरी होने तक सीमित नहीं है. जिन लोगों ने पानी की किल्लत से तंग आकर खुद का निजी बोर करवाया है, उन्हें बिजली विभाग धोखे दे रहा है. क्षेत्र में बिजली की आपूर्ति इतनी अनियमित है कि जब पानी की जरूरत होती है, तब बिजली गुल रहती है. बिना बिजली के मोटर नहीं चलती और बिना मोटर के प्यास नहीं बुझती. ऐसे में ग्रामीण दोहरी मार झेल रहे हैं.

मेगरी कड़ा में थमा टंकी का काम, प्रशासन मौन
ग्रामीणों ने बताया कि जल जीवन मिशन के तहत मेगरी कड़ा में एक बड़ी पानी की टंकी का निर्माण शुरू किया गया था. उम्मीद थी कि इस टंकी के बनते ही उदहीन बुजुर्ग समेत दर्जनों गांवों की प्यास बुझेगी. लेकिन पिछले काफी समय से इस टंकी का निर्माण कार्य अधर में लटका हुआ है. काम क्यों रुका है? इसका सटीक जवाब देने वाला कोई नहीं है. प्रांजल साहू और मुन्ना प्रकाश जैसे युवाओं का कहना है कि उन्होंने जिला मुख्यालय से लेकर जल निगम के दफ्तरों के कई चक्कर काटे, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पिलाई गई.

ग्राउंड जीरो पर महिलाओं का दर्द
जब Local-18 की टीम ग्राउंड जीरो पर पहुंची, तो वहां की महिलाओं का दर्द छलक पड़ा. बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि इस उम्र में जब उन्हें आराम करना चाहिए, तब वे 100-200 मीटर दूर से भारी बाल्टियां ढो रही हैं. महिलाओं का कहना है, ‘दो साल पहले दरवाजे पर पाइप गाड़ दिए गए, हमें लगा अब कष्ट दूर होगा. लेकिन न टोंटी लगी, न पानी आया. अफसरों से कहो तो वे सुनते नहीं.’ दर्जनों गांव इस समय इसी तरह ‘कागजी विकास’ की मार झेल रहे हैं.

जिम्मेदारों की अनदेखी पड़ रही भारी
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने जिलाधिकारी और जल निगम के उच्च अधिकारियों को लिखित शिकायतें दी हैं. मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी गुहार लगाई गई है, लेकिन समस्या का निस्तारण नहीं हुआ. पाइप बिछाने वाली कंपनी अपना काम आधा-अधूरा छोड़कर जा चुकी है और विभागीय अधिकारी फाइलों में ‘योजना सफल’ दिखाने में व्यस्त हैं. जब तक मेगरी कड़ा की टंकी चालू नहीं होती, तब तक इन गांवों की किस्मत नहीं बदलने वाली.



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