क्या आपने सुनी? दो संतो की सदियों पुरानी वो कहानी, जो आज भी हिंदू-मुस्लिम दिलों को जोड़ती है, जहां गंगा खुद उनके पास आ गई!

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क्या आपने सुनी? दो संतो की सदियों पुरानी वो कहानी, जो आज भी हिंदू-मुस्लिम दिलों को जोड़ती है, जहां गंगा खुद उनके पास आ गई!


सहारनपुर: ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ और ‘विशाल राह’ जैसे शब्द इस क्षेत्र की धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विरासत को दर्शाते हैं. यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के लोग वर्षों से एक साथ रहते आए हैं. हाजी शाह कमाल और बाबा लालदास जैसी ऐतिहासिक हस्तियों की विरासत इस क्षेत्र की गहरी सांस्कृतिक विविधता और भाईचारे की परंपरा को आज भी जीवित रखती है.

दो महान हस्तियों की अनोखी मित्रता
बाबा लालदास और हाजी शाह कमाल की मित्रता हिंदू-मुस्लिम एकता की अनोखी मिसाल है. दोनों की कुटिया पास-पास थीं और वे एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करते हुए साथ-साथ भक्ति और इबादत करते थे. कहा जाता है कि हाजी शाह कमाल, बाबा लालदास के मुरीद बनकर उनके निकट आए थे और उनकी प्रेरणा से ही बाबा लालदास हरिद्वार से गंगा जल सहारनपुर लेकर आए.

कई बार जब असामाजिक तत्वों ने शहर के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की, तब इन दो महान हस्तियों की मित्रता ने हमेशा भाईचारे को मजबूत किया. आज भी हाजी शाह कमाल की दरगाह और बाबा लालदास का मंदिर हिंदू-मुस्लिम एकता और भाईचारे की मिसाल के रूप में कायम हैं.

आज भी कायम है भाईचारे की मिसाल
स्थानीय साहित्यकार डॉ. वीरेंद्र आजम लोकल 18 से बात करते हुए बताते हैं कि बाबा लालदास और हाजी शाह कमाल को सहारनपुर की कौमी एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में जाना जाता है. किसी भी सद्भाव कार्यक्रम में इन दोनों की मित्रता का उदाहरण (मिसाल) दिया जाता है. बाबा लालदास एक सिद्ध योगी थे और उनकी आयु (उम्र) का ठीक अनुमान किसी को नहीं है कई लोग उनकी आयु 300 से 500 वर्ष बताते हैं.

वे घने जंगलों में एक छोटे से सरोवर के पास झोपड़ी बनाकर तपस्या करते थे. उनकी ख्याति शाहजहां के दरबार तक पहुंची, हालांकि वहां उन्हें प्रतिकूल रूप से प्रस्तुत किया गया था. इसी संदर्भ में शाहजहां ने अपने प्रसिद्ध फकीर हाजी शाह कमाल को उनकी परीक्षा लेने भेजा. हाजी शाह कमाल यहां पर आए और उन्होंने बाबा लालदास से कहा मुझको प्यास लगी है.

कमंडल से खत्म नहीं हुआ पानी
बाबा लालदास ने अपना कमंडल उठाकर हाजी शाह कमाल को पानी पिलाना शुरू किया. इस दौरान ना तो हाजी शाह कमाल की प्यास बुझी और ना ही बाबा लालदास के कमंडल से पानी खत्म हुआ. जिसके बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा और पहचान लिया. इसके बाद हाजी शाह कामल भी उनकी झोपड़ी के पास अपनी भी एक झोपड़ी लगाकर वहीं रहने लगे. इस दौरान दोनों के बीच गहरी मित्रता हो गई. हाजी शाह कमाल उनके इतने मुरीद हो गए थे और अगर कोई भी बात होती थी दोनों आपस में एक-दूसरे से शेयर करते थे चाहे वह खुदाई और इबादत को लेकर हो.

गंगा जल का अद्भुत चमत्कार
बाबा लालदास रोज प्रातः हरिद्वार गंगा स्नान के लिए जाया करते थे। एक दिन हाजी शाह कमाल ने उनसे कहा, क्या गंगा आपके लिए यहां नहीं आ सकती? इस पर बाबा लालदास ने गंगा से आह्वान किया. अगले दिन उनका लोटा और डंडा सरोवर में तैरते हुए दिखाई दिया. माना जाता है कि सहारनपुर के पास शकलापुरी क्षेत्र में गंगा का स्रोत फूटा, जो आज भी स्थानीय श्रद्धा का केंद्र है. यह कहानी न सिर्फ चमत्कार की, बल्कि मित्रता, आस्था और सौहार्द की गहरी मिसाल है.



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