गाजियाबाद की ‘पीली कोठी’: 150 साल पुराना वो महल, जिसे अंग्रेज इंजीनियर को इनाम में मिले थे 12 गांव

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गाजियाबाद की ‘पीली कोठी’: 150 साल पुराना वो महल, जिसे अंग्रेज इंजीनियर को इनाम में मिले थे 12 गांव


गाजियाबाद: दिल्ली-लखनऊ हाईवे से गुजरते समय गाजियाबाद के मसूरी में एक भव्य पीली इमारत ध्यान खींचती है. यह ‘पीली कोठी’ 18वीं सदी की विरासत को आज भी संजोए हुए है. इसका निर्माण 1864 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कराया था. 1857 की क्रांति के बाद, यमुना पुल बनाने वाले मैकेनिकल इंजीनियर जॉन माइकल्स को इस इलाके की निगरानी सौंपी गई थी. उनके बेहतरीन काम से खुश होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें यह कोठी और 12 गांवों की जागीर इनाम में दे दी थी.

दरअसल, 1857 की क्रांति के बाद बहादुर शाह जफर को पराजित करने के बाद अंग्रेजों ने दिल्ली के आसपास के इलाकों पर नजर रखने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को तैनात किया था. मसूरी और उसके आसपास की निगरानी की जिम्मेदारी यमुना पर लोहे का पुल बनाने वाले इंजीनियर जान माइकल्स को सौंपी गई थी, उनके लिए ही इस कोठी का निर्माण कराया गया था.

लगवाया गया था विशेष ईंट-भट्टा, बना गई थी 8 चक्कियां
इतिहास के जानकार बताते हैं कि अंग्रेजों ने निर्माण कार्य के लिए यहां विशेष ईंट भट्ठा लगवाया था. मसूरी की नहर की झाल पर आठ चक्कियां भी बनवाई गई थीं. जान माइकल्स दिल्ली-कलकत्ता रेल ट्रैक परियोजना में मैकेनिकल इंजीनियर भी रहे. उनके कार्य से खुश होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें इनाम में यह कोठी और आसपास के 12 गांवों की जागीर दे दी थी. उस समय इन गांवों के किसान लगान माइकल्स को देते थे. जीवन के अंतिम चरण में माइकल्स ने कोठी अपनी बेटी एएल कोपिंगर के नाम कर दी थी.

आसपास लगाई गई थी पक्के निर्माण पर रोक
उनकी शादी अपने मैनेजर करकनल से कराई गई और इसके बाद करकनल इस संपत्ति के मालिक बने. उन्होंने आसपास पक्के मकानों के निर्माण पर रोक लगा दी ताकि, इलाके में यह कोठी ही सबसे प्रमुख इमारत बनी रहे. 1947 में देश आजाद हुआ लेकिन करकनल यहीं रहे. 1952 में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू होने के बाद लगान व्यवस्था खत्म हुई और उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ गई.

1977 में 3 लाख में हुआ था सौदा
आखिरकार साल 1977 में उन्होंने यह कोठी मसूरी के दूध कारोबारी हाजी नजीर अहमद को 3 लाख रुपये में बेच दी और इंग्लैंड लौट गए. हाजी नजीर अहमद के बाद यह संपत्ति उनके बेटे पूर्व सांसद चौधरी अनवर अहमद के पास आई. वर्तमान में उनके पुत्र ताहिर अली और इफ्तिखार अहमद परिवार सहित यहां रहते हैं. ताहिर अली बताते हैं कि 70 के दशक में जब यह कोठी खरीदी गई तब गाजियाबाद मेरठ जिले का हिस्सा था. कचहरी में स्टांप नहीं मिला था और बैनामा सरकारी खाते में रकम जमा कर कराया गया था. आज के समय में पीली कोठी में 40 कमरों में से सिर्फ आठ कमरे ही खुले हैं जिनमें ताहिर अली और उनके छोटे भाई परिवार सहित रहते हैं.

आज भी बरकरार है कोठी की भव्यता
करीब 3000 वर्ग मीटर में फैली इस चार मंजिला कोठी में लगभग 40 कमरे हैं. ग्राउंड फ्लोर पर विशाल डाइनिंग हॉल है जिसमें आज भी ब्रिटिश काल की टेबल-कुर्सियां रखी हैं. कोठी के अंदर आज भी ब्रिटिश काल का डाइनिंग टेबल, शीशम और सागौन की लकड़ी की सीढ़ियां और बेल्जियम के 6 बड़े शीशे अपनी चमक बिखेर रहे हैं. हालांकि वक्त की मार से कुछ हिस्सों का प्लास्टर झड़ रहा है, लेकिन इसकी मजबूती आज के आधुनिक निर्माणों को मात देती है.

फिल्मकारों की पहली पसंद
पीली कोठी की ऐतिहासिक बनावट बॉलीवुड को खूब भाती है। अभिषेक बच्चन की फिल्म ‘रन’ की शूटिंग यहीं हुई थी। इसके अलावा मशहूर वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम’ और कई बड़े विज्ञापनों के लिए भी इस लोकेशन का इस्तेमाल किया गया है।



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