गोबर ने बदली इन महिलाओं की किस्मत, सुर्खियों में आया सुल्तानपुर का दुबेपुर गांव

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गोबर ने बदली इन महिलाओं की किस्मत, सुर्खियों में आया सुल्तानपुर का दुबेपुर गांव


Agency:News18 Uttar Pradesh

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Women Success Story : गोबर गैस प्लांट ने दुबेपुर गांव की महिलाओं को न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाया है बल्कि उन्हें आत्मविश्वस से भर दिया है. घर तो वे पहले ही चला रही थीं, अब घर चलाने में पैसों से भी मदद करने लगी हैं.

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बायोगैस के लिए यूनिट 

हाइलाइट्स

  • इन महिलाओं ने गोबर गैस प्लांट से आत्मनिर्भरता पाई.
  • गोबर गैस से डेयरी उत्पाद बनाने में मदद मिलती है.
  • प्रति वर्ष 90 हजार किलो अपशिष्ट का उपयोग होता है.

सुल्तानपुर. समय का सदुपयोग किसी को भी कामयाब बना सकता है. स्वावलंबन के लिए तो समय का सदुपयोग सबसे जरूरी गुण है. सुल्तानपुर की इन महिलाओं का कामयाबी का राज भी यही है. उन्होंने साबित कर दिखाया है कि अगर समय का सदुपयोग करना आता हो तो लगन और दिमाग से घर बैठे भी अच्छे पैसे कमाए जा सकते हैं. सुल्तानपुर की इन महिलाओं की किस्मत बदल रहा है एक गोबर गैस प्लांट, जिसने न सिर्फ इन्हें आत्मनिर्भर बनाया है बल्कि आत्मविश्वास से लबरेज कर दिया है.

सुल्तानपुर के दुबेपुर गांव की महिलाओं की ओर से स्वावलंबन के दिशा में उठाए गए इस कदम ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया है. इन महिलाओं ने गांव में गोबर गैस बनाने की एक इकाई स्थापित की है. इन महिलाओं ने गोबर से गैस बनाने का बाकायदा प्रशिक्षण ले रखा है. अब वे इसकी प्रक्रिया दूसरों को भी समझा और बता रही हैं. इन महिलाओं के इस कदम से जिले के आसपास की महिलाएं भी प्रेरित हुई हैं.

लोकल 18 से बातचीत में गोबर से गैस बनाने वाली यूनिट की अध्यक्ष सुशीला बताती हैं कि गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ये वैज्ञानिक विधि बड़े काम आ रही है. यहां गोबर गैस की पांच यूनिट लगाई गई हैं, जिसकी मदद से गाय, भैंस और अन्य जानवरों के गोबर से गैस बनाई जाती है.

इस काम में इस्तेमाल
‘हरित दिव्य महिला किसान उत्पादक कंपनी’ की डायरेक्टर ने बताया कि कंपनी की मदद से और आपसी तालमेल से गोबर से गैस बनाकर महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं. गोबर गैस का प्रयोग खोया और अन्य डेयरी उत्पाद बनाने में किया जाता है. इससे लोगों को बाहर से गैस खरीदनी नहीं पड़ती. कम कीमत होने के कारण उन्हें भी काफी बचत हो जाती है.

सुल्तानपुर के दुबेपुर गांव में स्थापित इस यूनिट में प्रतिवर्ष 90 हजार किलो अपशिष्ट का प्रयोग किया जाता है, जिसमें 2.70 लाख टन बायोफर्टिलाइजर का उत्पादन किया जाता है. इससे 35 टन कार्बन डाइऑक्साइड भी कम होता है. महिलाओं के इस प्रोजेक्ट से उन्हें अच्छी कमाई हो रही है.

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