ग्राउंड रिपोर्ट : राख से घुट रहा यूपी का ये गांव! काली छतें, बर्बाद खेत और हर घर में बीमार…हर बीमारी यहां
झांसी. पारीछा पावर प्लांट की चिमनियां सिर्फ धुआं नहीं उगल रहीं, झांसी के इस गांव की ज़िंदगी का रंग छीन रही हैं. यहां सुबह ओंस से नहीं, जहरीली राख से शुरू होती है. खेतों पर उड़कर गिरती राख मिट्टी की जान चूस रही है. छतों पर काली परत जमती है और सफेद दीवारें राख के बोझ तले घुटती दिखती हैं. हवा में इतनी महीन राख घुली है कि देखने में धुंध लगती है, लेकिन ये धुंध नहीं, जहर है. गांव की गलियों से गुजरते हुए पता चलता है कि यहां सांस लेना भी मेहनत का काम है. बच्चों के बालों पर राख बैठी रहती है, बर्तन धोकर रखो—एक घंटे में फिर काले. खिड़की खोलो तो घर में धुएं का बादल उतर आता है. गांव की महिलाएं बताती हैं कि झाड़ू पोछा रोज दो बार करने पर भी फर्श पर राख की नई परत आ बैठती है. कपड़े, बर्तन, अनाज—कुछ भी साफ नहीं बचता.
फसलें दबी, उम्मीदें टूटी
सबसे ज्यादा नुकसान खेतों को हुआ है. राख की बारीक परत मिट्टी में जाकर उसकी बनावट खराब कर रही है. किसान बताते हैं कि गेहूं की बालियां समय से पहले झुलस जाती हैं. दलहन की पत्तियां काली पड़ जाती हैं. सिंचाई का पानी भी बदरंग है. खेत में खड़े किसान के चेहरे पर सिर्फ चिंता नहीं—हार मानने की झलक भी नजर आती है, क्योंकि जितना बोते हैं, उतना मिल नहीं रहा. गांव का पानी पीने लायक नहीं बचा. कुओं के किनारों पर राख की मोटी परत चिपकी रहती है. टंकी पर उंगली फिराओ तो काली गंदगी उतर आती है. हैंडपंप का पानी पीलेपन और बदबू के साथ निकलता है. बच्चों के पेट में संक्रमण बढ़ा है और महिलाओं की आंखों में जलन अब कोई “लक्षण” नहीं—ये रोज का दर्द है. डॉक्टर की कमी और दूरी इस हालात को और खतरनाक बना देती है.
आवाज उठती है, लेकिन जवाब नहीं आता
गांव में खांसी इतनी आम है कि लोगों ने इसे बीमारी नहीं, आदत मान लिया है. सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और किशोर हैं. खांसी, सांस फूलना, सीने में जलन—इन सबने उम्र से पहले बुढ़ापे जैसा हाल कर दिया है. डॉक्टर के पास जाने पर सभी को एक ही सलाह मिलती है—“ये हवा तुम्हारे लिए खराब है.” पर जाएं कहां? यह उनका खुद का घर है. ग्रामीणों ने शिकायतें दर्ज कीं. कई बार लिखा, कई बार बोले—लेकिन हर बार जवाब वही- “जल्द कार्रवाई होगी.” गांव वाले कहते हैं कि हवा में उड़ती राख जैसी—वादे भी उड़कर आते हैं और उड़कर गायब हो जाते हैं. कोई ठोस कदम, कोई निगरानी, कोई समाधान—कुछ भी जमीन पर नहीं उतरा.
हिसाब कौन देगा
पावर प्लांट की राख गांव की छतों तक कैसे पहुंच रही है? राख निस्तारण के नियमों का पालन कौन देख रहा है? हवा की मॉनिटरिंग और कचरा प्रबंधन का रिकॉर्ड जनता क्यों नहीं देख पाती? ये सवाल गांव की हवाओं में तैर रहे हैं, लेकिन जवाब किसी दफ्तर की फाइलों में गुम हैं. यह सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं—यह जिंदगी का सवाल है. जब हवा सांस लेने लायक नहीं होती है और पानी पीने जैसा नहीं जाता, तो गांव बसता नहीं—घुटता है. पारीछा की यह राख ग्रामीणों के घरों पर नहीं, उनके भविष्य पर गिर रही है. अगर जवाबदेही तय नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां बीमारियां ही विरासत में पाएंगी.