चौक से विश्वनाथ धाम तक… क्या है इस ऐतिहासिक जुलूस के पीछे छिपी कहानी? जानिए
Last Updated:
शाहजहांपुर का बाबा विश्वनाथ मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि शहर के इतिहास और जनआंदोलन की एक जीवंत मिसाल है. 1950 के दशक में टाउन हॉल के पास शुरू हुआ एक विवाद धीरे-धीरे जनभावनाओं का आंदोलन बना और अंततः भव्य मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ. यही मंदिर आज प्रसिद्ध ‘लाट साहब’ होली जुलूस का अहम पड़ाव भी है, जो शाहजहांपुर की सांस्कृतिक पहचान को पूरे देश में अलग पहचान देता है.
बाबा विश्वनाथ मंदिर का इतिहास 1950 के दशक के एक दिलचस्प घटनाक्रम से जुड़ा है. उस समय टाउन हॉल के पास अमरूद का बाग हुआ करता था. इतिहासकार बताते हैं कि तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष फजलुर्रहमान वहां मस्जिद बनाना चाहते थे, जबकि हिंदू समुदाय वहां शिव मंदिर के लिए अडिग था. यह विवाद तब और गहरा गया जब स्थानीय लोगों ने अपनी आस्था को बचाने के लिए संगठित प्रयास शुरू किए और अगले चेयरमैन बिशनचंद्र सेठ के समय मंदिर की मांग ने जन आंदोलन का रूप ले लिया.

इतिहास में दर्ज है कि एक रात सरदार दर्शन सिंह ने एडवोकेट के निवास से एक शिवलिंगनुमा पत्थर लाकर वर्तमान स्थल पर स्थापित कर दिया गया. डॉ. एनसी मेहरोत्रा की किताब के मुताबिक, इस गुप्त प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वहां विधि-विधान से पूजा शुरू हो गई. प्रशासन ने विवाद बढ़ता देख परिसर को सील तो किया, लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था कम नहीं हुई. आखिरकार 1956 में ‘बाबा विश्वनाथ मंदिर’ नाम से एक कमेटी का पंजीकरण कराया गया, जिससे मंदिर को वैधानिक आधार मिला.

साल 1957 मंदिर के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ. श्रद्धालुओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद से मिलकर मंदिर निर्माण की गुहार लगाई. उनकी अनुमति मिलते ही प्रशासन ने सील हटा दी और भव्य मंदिर का निर्माण कार्य जोर-शोर से शुरू हो गया. आज यह चार एकड़ में फैला विशाल परिसर है, जहां न केवल शिव आराधना होती है, बल्कि समाज सेवा के लिए एक धर्मशाला और स्कूल का संचालन भी मंदिर कमेटी की ओर से कुशलतापूर्वक किया जा रहा है.
Add News18 as
Preferred Source on Google

बाबा विश्वनाथ मंदिर कमेटी केवल धार्मिक कार्यों तक सीमित नहीं है. यह संस्था शाहजहांपुर के सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूती प्रदान करती है. कमेटी की ओर से शहर के दो प्रमुख मोक्ष धामों का प्रबंधन और स्कूल का संचालन किया जाता है, जो उनकी सेवा भावना को दर्शाता है. महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहां लाखों की भीड़ उमड़ती है. मंदिर की भव्य आरती और शांत वातावरण दूर-दराज से आने वाले भक्तों को एक अनूठा आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करता है.

शाहजहांपुर की होली पूरे विश्व में अपनी विशिष्ट ‘लाट साहब’ की परंपरा के लिए जानी जाती है. इस जुलूस का सीधा संबंध शहर की ऐतिहासिक धरोहरों और बाबा विश्वनाथ मंदिर से है. होली के दिन निकलने वाला यह जुलूस ब्रिटिश काल के विरुद्ध एक सांकेतिक विरोध और लोक संस्कृति का हिस्सा बन चुका है. इसकी शुरुआत चौक स्थित बाबा चौकसी नाथ मंदिर से होती है, जहां से भैंसा गाड़ी पर सवार लाट साहब का कारवां पूरे शहर का भ्रमण करता है.

चौक के बाबा चौकसी नाथ मंदिर से जब यह विशाल जुलूस निकलता है, तो पूरे शाहजहांपुर की सड़कों पर उत्साह का सैलाब उमड़ पड़ता है. यह जुलूस शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए टाउन हॉल स्थित बाबा विश्वनाथ मंदिर पहुंचता है. यहां जुलूस का पहुंचने का विशेष महत्व है, क्योंकि यह दो ऐतिहासिक मंदिरों के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का कार्य करता है. भक्त और हुड़दंगियों की टोलियां इस मार्ग पर पारंपरिक गीतों और अबीर-गुलाल के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं.

बाबा विश्वनाथ मंदिर पर जब लाट साहब का जुलूस पहुंचता है, तो सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच एक अनूठा दृश्य देखने को मिलता है. यहां पहुंचकर जुलूस की गरिमा और सुरक्षा दोनों का ध्यान रखा जाता है. मंदिर परिसर के बाहर का माहौल उमंग से भरा होता है. इतिहासकार इसे केवल एक जुलूस नहीं, बल्कि शाहजहांपुर की सामूहिक पहचान मानते हैं. विश्वनाथ मंदिर इस ऐतिहासिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो शहर की धार्मिक और सामाजिक एकता को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है.