न मोबाइल, न वीडियो गेम… जब मिट्टी के दीयों से बनते थे तराजू, इन तस्वीरों को देख आपको भी आ जाएगी बचपन की याद
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दीपावली का पर्व आते ही पहले के समय में बच्चों के चेहरों पर खास चमक और उत्साह दिखाई देता था. उस दौर में न तो मोबाइल फोन थे और न ही इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों का चलन. ऐसे में दीपावली उनके लिए सिर्फ रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि खुशियों और रचनात्मकता का अवसर बन जाती थी. जब घरों में मिट्टी के दीये सजाए जाते थे, तो बच्चे इन्हीं दीयों से अपने अनोखे खेल तैयार कर लेते थे.
गांवों में दीपावली के दिनों में बच्चों का सबसे पसंदीदा खेल होता था मिट्टी के दीयों से तराजू बनाना. दो छोटे दीये, एक पतली लकड़ी की छड़ी और धागे की मदद से बच्चे खुद का तराजू बना लेते थे, बिलकुल वैसा जैसा दुकानदारों के पास होता था. यह खेल उनकी कल्पनाशक्ति और हुनर का सुंदर उदाहरण था.

उस समय बच्चों के पास खेलने के लिए बहुत सीमित साधन होते थे, लेकिन उत्साह की कोई कमी नहीं थी. दीपावली में जब दीयों की पंक्तियां जगमगाती थीं, बच्चे उसी समय “तराजू बनाओ और व्यापारी बनो” जैसे खेलों में खो जाते थे.

कोई “दुकानदार” बनता था, कोई “ग्राहक” और मिट्टी, बीज, फूल या कंकड़ “सामान” बन जाते थे. इस खेल में व्यापार, बातचीत और साझेदारी की सीख भी शामिल होती थी.

दिए वाला तराजू सिर्फ एक खेल नहीं था, बल्कि उसमें सीख छिपी होती थी. खेल-खेल में बच्चे संतुलन, बराबरी और नाप-तौल की समझ हासिल कर लेते थे. जब दोनों दीयों में समान वजन डालने की कोशिश होती थी, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से संतुलन का महत्व समझने लगते थे. यह शिक्षा किसी किताब से नहीं, बल्कि अनुभव से मिलती थी.

इन खेलों की एक और खूबसूरती यह थी कि वे सामूहिकता और दोस्ती की भावना को बढ़ाते थे. बच्चे अकेले नहीं खेलते थे, बल्कि मिल-जुलकर काम बांटते थे. कोई तराजू बनाता, कोई ग्राहक बनता, तो कोई सामान बेचता. इस साझेदारी में सहयोग, खुशी और एकजुटता की झलक मिलती थी.

खेलते समय बच्चे अक्सर लोकगीत या बाल कविताएं भी गुनगुनाते थे, जैसे- “तोला-तोला तोल दूं मैं, कितना लेगा रे भाई…”. ये गीत खेल में संगीत और जोश भर देते थे. हर आवाज में बचपन की मासूमियत और लोक संस्कृति की मिठास झलकती थी.

आज समय बदल गया है. मिट्टी के दिए से बने तराजू की जगह इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों और मोबाइल गेम्स ने ले ली है. लेकिन उन दिनों के मिट्टी, लकड़ी और धागे से बने खिलौने न सिर्फ पर्यावरण के अनुकूल थे, बल्कि बच्चों को प्रकृति से जोड़ने वाले भी थे. वे खेल सादगी, रचनात्मकता और एक साथ सीखने की परंपरा के प्रतीक थे, जो आज भी याद आते हैं तो दिल में एक मीठी मुस्कान छोड़ जाते है.