पीलीभीत का अनोखा शिव मंदिर, यहां खुद ही प्रकट हुआ था शिवलिंग, जानिए मान्यता
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Pilibhit Dugdheswar Nath Temple: पीलीभीत के कुंवरगढ़ क्षेत्र में स्थित प्राचीन दुग्धेश्वर नाथ महादेव मंदिर, जिसे दूधिया मंदिर भी कहा जाता है, आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां सोमवार के साथ शनिवार को भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन शमी वृक्ष की विशेष मान्यता है, जिसकी पूजा से ग्रह दोष दूर होने और सुख-समृद्धि मिलने की मान्यता है. बताया जाता है कि यह शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ था और इसकी ख्याति आसपास के जिलों से लेकर उत्तराखंड तक फैली हुई है.
पीलीभीत. आमतौर पर आपने देखा होगा कि शिवालयों में सोमवार के दिन भक्तों का सैलाब उमड़ता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में एक ऐसा पौराणिक मंदिर भी है, जहां एक विशेष परम्परा प्रचलित है. यहां न सिर्फ सोमवार बल्कि शनिवार को भी श्रद्धालुओं का भारी तांता लगा रहता है. दरअसल, यह शिवालय पीलीभीत शहर के कुंवरगढ़ इलाके में स्थित प्राचीन दुग्धेश्वर नाथ महादेव मंदिर है, जिसे स्थानीय लोग दूधिया मंदिर के नाम से भी जानते हैं. इस मंदिर की मान्यता केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि आसपास के तमाम क्षेत्रों में भी काफी अधिक है.
मंदिर के महंत पंडित कामता प्रसाद ने Local 18 से बातचीत में बताया कि यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है. सैकड़ों साल पहले यहां घना जंगल हुआ करता था. हालांकि इसकी स्थापना का सटीक वर्ष बताना मुश्किल है, लेकिन मान्यता यही है कि यहां का शिवलिंग स्वयं ही प्रकट हुआ था, जिसके बाद भक्तों ने धीरे-धीरे यहां मंदिर स्थापित कर दिया. इस पौराणिक मंदिर में शनिवार को लगने वाली भीड़ के पीछे एक विशेष धार्मिक कारण है. मंदिर परिसर में एक अत्यंत प्राचीन शमी वृक्ष स्थापित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शमी वृक्ष की जड़ों में माता लक्ष्मी का वास होता है और इसकी पूजा करने से सभी ग्रहों की शांति होती है. यही वजह है कि शनिवार के दिन विशेष रूप से ग्रहों के दोष निवारण और सुख-समृद्धि की कामना के लिए दूर-दराज से लोग यहां खिंचे चले आते हैं.
उत्तराखंड तक फैली है इस वृक्ष की ख्याति
शहर के जानकारों की मानें तो एक समय ऐसा था जब इस शमी वृक्ष के पूजन के लिए लोग सिर्फ पीलीभीत ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों से भी यहां आया करते थे. हालांकि समय के साथ अब अन्य स्थानों पर भी शमी के वृक्ष सुलभ होने लगे हैं और अन्य पूजन स्थल भी प्रचलित हो गए हैं, लेकिन इस मंदिर के शमी वृक्ष की प्राचीनता के कारण इसका अपना एक अलग ही आध्यात्मिक महत्व आज भी बना हुआ है.
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पिछले एक दशक से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं. 2010 में प्रिंट मीडिया से अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की, जिसके बाद यह सफर निरंतर आगे बढ़ता गया. प्रिंट, टीवी और डिजिटल-तीनों ही माध्यमों म…और पढ़ें