फरसे वाले बाबा: हाथ में फरसा और दिल में गौ-सेवा, कैसे बने चंद्रशेखर जननायक?

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फरसे वाले बाबा: हाथ में फरसा और दिल में गौ-सेवा, कैसे बने चंद्रशेखर जननायक?


मथुरा: उत्तर प्रदेश का ब्रज क्षेत्र अपनी भक्ति और शांति के लिए जाना जाता है, लेकिन शनिवार तड़के एक ऐसी खबर आई जिसने पूरे मथुरा-आगरा हाईवे को छावनी में बदल दिया. जिसे लोग ‘चंद्रशेखर’ के नाम से जानते थे, उन ‘फरसे वाले बाबा’ की सड़क हादसे में मौत हो गई. बाबा की मौत की खबर मिलते ही हजारों की भीड़ सड़क पर उतर आई, पथराव हुआ, पुलिस की गाड़ियां टूटीं और आंसू गैस के गोले छोड़े गए. लेकिन आखिर एक साधु के लिए इतना बड़ा जनाक्रोश क्यों? कौन थे ये ‘फरसे वाले बाबा’ और उनके नाम के पीछे की कहानी क्या है? आइए विस्तार से जानते हैं.

क्यों पड़ा ‘फरसे वाले बाबा’ नाम?
ब्रज के कोसीकलां और छाता इलाके में चंद्रशेखर एक जाना-पहचाना नाम थे. लेकिन आम जनता के बीच वे ‘फरसे वाले बाबा’ के नाम से मशहूर थे. इसके पीछे एक खास वजह थी. चंद्रशेखर सिर्फ माला जपने वाले साधु नहीं थे, बल्कि वे एक योद्धा गौ-सेवक थे. वे जब भी निकलते थे, उनके हाथ में एक बड़ा और चमकता हुआ ‘फरसा’ (कुल्हाड़ी जैसा हथियार) हमेशा अपने साथ रखते थे.

क्षेत्र के लोग बताते हैं कि अवैध गौ-तस्करी रोकने के लिए बाबा हमेशा मुस्तैद रहते थे. उनके हाथ का वह फरसा उनके निडर स्वभाव और गौ-वंश की रक्षा के संकल्प का प्रतीक बन गया था. इसी पहचान की वजह से उनका नाम ‘फरसे वाले बाबा’ पड़ गया. वे केवल नाम के बाबा नहीं थे, बल्कि उन्होंने युवाओं की एक ऐसी फौज (करीब 200 युवक) तैयार की थी, जो एक आवाज पर गौ-तस्करी रोकने के लिए निकल पड़ती थी.

8 साल की उम्र में वैराग्य और अयोध्या का सफर
फरसे वाले बाबा मूल रूप से फिरोजाबाद के गांव ‘गोपाल के नगला’ के रहने वाले थे. उनका जीवन शुरू से ही संघर्षपूर्ण और आध्यात्मिक रहा. महज 8 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने घर-परिवार का मोह त्याग दिया और साधु बन गए. घर छोड़कर वे अयोध्या चले गए, जहां उन्होंने करीब 20 साल बिताए. बाबा ने श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी. अयोध्या के बाद वे ब्रज आए और यहां के अंजनोख (छाता ब्लॉक) में अपनी कर्मभूमि बनाई. यहां उन्होंने एक विशाल गौशाला की स्थापना की और अपना पूरा जीवन गौ-सेवा के नाम कर दिया.

हादसे की वह काली रात: क्या हुआ था शनिवार को?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बाबा के समर्थकों और गौरक्षकों का दावा है कि शनिवार तड़के करीब 4 बजे बाबा को सूचना मिली थी कि कोसीकलां के रास्ते गौ-वंश से भरा एक कंटेनर गुजरने वाला है. सूचना मिलते ही बाबा अपनी टीम के साथ बाइक से उस कंटेनर का पीछा करने निकल पड़े. समर्थकों का आरोप है कि गौ-तस्करों ने जानबूझकर बाबा की बाइक में टक्कर मारी और उन्हें कुचल दिया.

जैसे ही यह खबर फैली, माहौल तनावपूर्ण हो गया. दिल्ली-आगरा हाईवे पर जाम लग गया. आक्रोशित भीड़ ने पुलिस और प्रशासन की गाड़ियों पर पथराव कर दिया, जिसमें एसडीएम की गाड़ी भी क्षतिग्रस्त हो गई. स्थिति को संभालने के लिए भारी पुलिस बल और सुरक्षाकर्मियों को मोर्चा संभालना पड़ा.

हत्या या महज हादसा?
एक तरफ जहां समर्थक इसे हत्या बता रहे हैं, वहीं मथुरा पुलिस इसे एक दुखद सड़क हादसा करार दे रही है. मथुरा के एसएसपी श्लोक कुमार के मुताबिक, बाबा जिस कंटेनर का पीछा कर रहे थे, उसमें गौ-वंश नहीं बल्कि ‘किराने का सामान’ लदा था. घने कोहरे के कारण पीछे से आ रहे एक अन्य ट्रक (जो राजस्थान नंबर का था और उसमें तार लदे थे) ने बाबा की बाइक को टक्कर मार दी. पुलिस का कहना है कि जिस ट्रक से टक्कर हुई, उसका चालक और परिचालक भी घायल हुए हैं और उनका इलाज चल रहा है. पुलिस ने साफ किया है कि प्राथमिक जांच में गौ-तस्करी जैसा कोई मामला सामने नहीं आया है.

सीएम योगी ने लिया संज्ञान
मथुरा के हालातों को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले का तुरंत संज्ञान लिया. उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि घटना की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए. फिलहाल क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाने के लिए भारी पुलिस बल तैनात है और बाबा के अनुयायी न्याय की मांग कर रहे हैं.



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