बजर खान की ढोलकें: पुश्तैनी हुनर से भारत और विदेशों तक बनाई पहचान, 200 साल पुराना है कारोबार!

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बजर खान की ढोलकें: पुश्तैनी हुनर से भारत और विदेशों तक बनाई पहचान, 200 साल पुराना है कारोबार!


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अमरोहा की ढोलक बनाने की 200 साल पुरानी पुश्तैनी परंपरा आज भी जीवित है. बजर खान पिछले 20 साल से इस हुनर को बढ़ावा दे रहे हैं. उनकी आम और शीशम की ढोलकें पूरे भारत और विदेशों तक निर्यात होती हैं, और ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार ऑर्डर भी कर सकते हैं.

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मुरादाबाद. अमरोहा में ढोलक बनाने का काम पिछले 200 वर्षों से पारंपरिक हुनर के रूप में जारी है. यहां की ढोलक मुख्य रूप से आम और शीशम की लकड़ी से बनाई जाती है. ये ढोलक न केवल देश के प्रमुख बाजारों जैसे दिल्ली, मुंबई, उज्जैन, हरिद्वार और वाराणसी में बिकती हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, विशेषकर कनाडा और अमेरिका में भी निर्यात की जाती हैं.

ढोलक कारोबारी बजर खान ने बताया कि वे पिछले 20 वर्षों से इस व्यवसाय में सक्रिय हैं. उन्होंने कहा कि अमरोहा में पुश्तैनी काम के रूप में ढोलक बनाने की परंपरा आज भी जीवित है. यहां हर आकार की ढोलक तैयार की जाती है, चाहे वह छोटी हो या बड़ी. इसके अलावा ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार विशेष ऑर्डर भी दे सकते हैं. बजर खान ने कहा, “यह हमारा पुश्तैनी व्यवसाय है और मैं इसी पारंपरिक हुनर को बढ़ावा दे रहा हूं, पिछले 20 साल से यह काम हमारा परिवार चला रहा है.

लोग ऑनलाइन संपर्क करके भी खरीदते ढोलक 

बजर खान ने आगे बताया कि उनके द्वारा बनाई गई ढोलक राजस्थान, गुजरात और अन्य राज्यों में खूब बिकती हैं. इसके अलावा पूरे भारत से ढोलक की मांग रहती है. वे विभिन्न मेलों और स्टॉलों के माध्यम से भी ढोलक बेचते हैं, ग्राहक सीधे उनके घर आकर या ऑनलाइन संपर्क कर भी ढोलक खरीदते हैं. इस व्यवसाय के चलते उन्हें अच्छा मुनाफा होता है और यह कारोबार सफलतापूर्वक चल रहा है. अमरोहा की यह परंपरागत कला न केवल स्थानीय पहचान को मजबूती देती है, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प को वैश्विक मंच पर भी प्रदर्शित करती है. पुश्तैनी हुनर और आधुनिक विपणन के मेल से यह व्यवसाय आने वाले समय में और विकसित होने की पूरी क्षमता रखता है.

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Monali Paul

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जानिए क्यों अमरोहा की पुश्तैनी ढोलकें की विदेशों तक है मांग



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