बुढ़ापे की उम्र मुसीबत में काट रहे रामसेवक, कीड़े-मकोड़ों के बीच बीतता है दिन
Agency:News18 Uttar Pradesh
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Maharajganj News: व्यक्ति जीवन भर अपने परिवार के लिए संघर्ष करता है. इसके बावजूद बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें उनके परिवार उन्हें घर से ही निकल देता है. ऐसी ही एक घटना देखने को मिलती है. महराजगंज जिले में जहा…और पढ़ें
रामसेवक
हाइलाइट्स
- रामसेवक ने नहर किनारे झोपड़ी में बनाई शरण.
- आसपास के गांवों में मजदूरी कर गुजारा करते हैं.
- बरसात में झोपड़ी में कीड़े-मकोड़े और दीवारें कमजोर.
महराजगंज: आज के समय में जहां चारों तरफ विकास और समानता की बात हो रही है. वहीं, कुछ लोग ऐसे हैं जो अभी भी दयनीय स्थिति में अपना गुजारा कर रहे हैं. जिले के मिठौरा क्षेत्र के हरखोड़ा के रहने वाले रामसेवक गांव से ही नजदीक एक नहर के किनारे रहते हैं. उन्होंने नहर के किनारे अपनी खेत में एक झोपड़ी बनाया है. जहां वह रहते हैं.
रामसेवक गांव से दूर एक सुनसान से जगह पर रहते हैं. जहां उनके पास अपने जरूरत के सामान भी नहीं है. बस किसी तरह वह यहां अपना बचा हुआ जीवन काट रहे हैं. एक व्यक्ति अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा अपने बच्चों और परिवार को बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने में बिता देता है, लेकिन जिस उम्र में व्यक्ति को अपने बच्चों का सहारा होता है. उस उम्र में रामसेवक गांव से कहीं दूर एक झोपड़ी में अपना जीवन काट रहे हैं.
आस पास के गांवों में करते हैं मजदूरी
रामसेवक ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान बताया कि बीते डेढ़ साल से वह पारिवारिक कारणों कि वजह से घर छोड़कर नहर के किनारे रह रहे हैं. अपने खेत में एक झोपड़ी डालकर उसी में रहते हैं. दिन में आस–पास के गांव के लोगों के खेतों में काम करते हैं, जिनसे उन्हें कुछ पैसा मिल जाता है. उन्होंने बताया कि दूसरों के खेतों में ज्यादा दिनों तक काम तो नहीं मिल पाता है.
बता दें कि महीने में 10 दिन का काम मिल जाए. वही बहुत बड़ी बात है. उन्होंने बताया कि इन्हीं 10 दिनों के मजदूरी से मिले पैसों से ही किसी तरह रहना खाना हो पाता है. कई बार स्थिति ऐसी उत्पन्न होती है कि खाने के लिए भी व्यवस्था नहीं होती और आसपास के गांव से कुछ मांगकर खाना पड़ता है. कुछ लोग हैं, जो उन्हें आस–पास के गांव में जानते हैं, जिसकी वजह से वह कुछ दे देते हैं.
बरसात के समय में होती है ये समस्याएं
रामसेवक ने बताया कि आसपास के गांव के कुछ लोग हैं, जो ऐसी स्थिति में उनकी मदद कर देते हैं. इनके झोपड़ी में देखने पर किसी भी व्यक्ति के आंखों में आंसू आ सकता है. क्योंकि यहां जीवन की मूलभूत सुविधा भी नहीं है. रामसेवक बताते हैं कि बरसात के समय में झोपड़ी में कीड़े मकोड़े भी आ जाते हैं. इसके साथ ही इस झोपड़ी की दीवारें बरसात के दिनों में एकदम कमजोर हो जाती है और उनके ध्वस्त होने का भी खतरा बना रहता है.
जीवन के आखिरी समय में भी वह खुद खाना बनाते हैं और सारा काम वही अपनी झोपड़ी में करते हैं. उन्होंने बताया कि उन्हें देखने के लिए भी कोई नहीं आता और ना ही प्रशासन की तरफ से ही कोई मदद मिलता है.
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January 31, 2025, 11:07 IST