मशीन से नहीं गंगाराम हाथ से तैयार करते हैं मिट्टी के कुल्हण, बर्तन, जाने पूरी प्रक्रिया
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मिट्टी का बर्तन कैसे बनाया जाता है, इसको जानने से पहले हम आपको बताएंगे इसमें कितना समय लगता है. नानपारा क्षेत्र के रजवापुर में रहने वाले कुम्हार गंगाराम ने लोकल 18 से बताया कि दरअसल मिट्टी के बर्तन कुल्हड़, गिलास, घड़े आदि सामग्री को बनाने के लिए कुम्हार सबसे पहले खास पीली मिट्टी की खरीदारी करता है. जिसकी कीमत समय के हिसाब से बढ़ती, घटती रहती है. कभी 2000 ट्राली तो कभी 3000 रुपये ट्राली के हिसाब से होती है.
बहराइच: गर्मियों का सीजन आते ही लोग मिट्टी के बर्तन में पानी, चाय पीना और घरों में इस्तेमाल करना चाहते हैं. लेकिन कई बार मार्केट से उनको 10-20 रुपये के बर्तन भी महंगे लगते हैं और लोग नहीं खरीदते हैं. लेकिन जानकर बेहद हैरानी होगी कि एक बर्तन को बनाने में कितना समय लगता है और कितनी मेहनत, मिट्टी को भिगोने से बनने तक करनी पड़ती है. बहराइच के कुम्हार ने बताई मिट्टी के बर्तन बनाने की पूरी दास्तान.
कैसे तैयार होते हैं मिट्टी के बर्तन
मिट्टी का बर्तन कैसे बनाया जाता है, इसको जानने से पहले हम आपको बताएंगे इसमें कितना समय लगता है. नानपारा क्षेत्र के रजवापुर में रहने वाले कुम्हार गंगाराम ने लोकल 18 से बताया कि दरअसल मिट्टी के बर्तन कुल्हड़, गिलास, घड़े आदि सामग्री को बनाने के लिए कुम्हार सबसे पहले खास पीली मिट्टी की खरीदारी करता है. जिसकी कीमत समय के हिसाब से बढ़ती, घटती रहती है. कभी 2000 ट्राली तो कभी 3000 रुपये ट्राली के हिसाब से. इसके बाद कुम्हार आवश्यकता अनुसार मिट्टी में पानी मिलाकर इसको 1 दिनों के लिए छोड़ देता है. अगले दिन इसको हाथों से आटे की तरह हाथों से गूंद फिर शुरू होता है बर्तन बनाने का सिलसिला जिसको बनाने में सुबह से शाम तक का समय लग जाता है और फिर बारी आती है सूखाने की इसको सूखने में भी कम से कम 1 से 2 दिन का समय लगता है. अगर मौसम ठीक है तो तीन से चार दिन इसको पकाने में या यूं कह लीजिए कि पूरा प्रक्रिया 6 से 7 दिन की होती है. ध्यान न देने पर बहुत सारे टूट भी जाते हैं तब जाकर यह बर्तन बनकर तैयार होते हैं.
मशीन नहीं हाथ का करते हैं प्रयोग
नानपारा क्षेत्र के रजवापुर में रहने वाले कुम्हार गंगाराम ने लोकल 18 टीम कुम्हार पहले थोड़ी सी मिट्टी को लेकर पहिया नुमा बने हुए चाक पर रखकर चाक को डंडे की सहायता से तेजी से घूमते हैं और जब चाक खूब तेजी से घूमने लगता है, तब हल्के हाथों से जिस भी चीज को बनाना होता है दिमाग में सेट करके उसका आकार हाथों से देते हैं. कई बार दबाव अधिक या बराबर न पड़ने पर बर्तन टूट जाते हैं. ऐसे में फिर से चाक घूमना पड़ता है. एक बार चाक को घूमने के बाद लगभग 10 मिनट तक की इसकी रफ्तार रहती है. इस 10 मिनट में कुमार 10 से 15 छोटे आइटम बनाकर तैयार कर देते हैं. जैसे दही का कुल्हड़ चाय का कुल्हड़ दीप लेकिन वही अगर बात की जाए बड़ा घड़ा या मटका बनाने की तो इसमें चाक को कई बार घूमना पड़ता है. तब जाकर मिट्टी का बर्तन तैयार होता है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें