महाकुंभ और गंगा नदी प्रदूषण की पूर्ण जानकारी।

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महाकुंभ और गंगा नदी प्रदूषण की पूर्ण जानकारी।

जैसा कि पिछले कुछ सप्ताह में महाकुंभ ने करोड़ों लोगों को आकर्षित किया, इसे विश्व का सबसे बड़ा मानव समागम माना जाता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार 50 करोड़ से ज्यादा नागरिकों ने महाकुंभ में आए थे। लोगों ने गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाकर, अपनी अटूट आस्था  का परिचय दिया।

लेकिन क्या सरकार ने सब की आस्था के साथ खिलवाड़ किया है?

हिंदू धर्म में गंगा नदी की बहुत अधिक पूजा की जाती है गंगोत्री, ऋषिकेश, हरिद्वार, बनारस जैसे अनेक हिंदू तीर्थ स्थल इस नदी के तट पर स्थित है। और प्रयागराज वह स्थान है जहां गंगा और यमुना नदियां मिलती हैं, और हिंदू इसे गंगा मैया कहते हैं, लेकिन इसी गंगा मैया के पानी को सरकार ने कितना प्रदूषित किया है।

संगम पर नदी का पानी पीने की तो बात छोड़िए डुबकी लगाने के लिए भी सुरक्षित नहीं है।

 यह बात सरकार के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कही।

शॉर्ट में कहा जाए। (CPCB) यह एक एजेंसी है जो सरकार की मिनिस्ट्री आफ एनवायरमेंट और फॉरेस्ट के अंदर आती है किसी पानी को पीना या पानी के अंदर जाना कितना सुरक्षित है।इसे मेजर करने के लिए दो-तीन तरीके होते हैं।

जिनमें से एक तरीका या है कि ,(BOD) फुल फॉर्म बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड यह एक नंबर है जो बताता है कि एरोबिक माइक्रो ऑर्गेनिस्ट मास के किसी भी पानी में मौजूद ऑर्गेनिक मैटर को तोड़ने के लिए कितनी ऑक्सीजन चाहिए अगर पानी के (BOD) लेवल बहुत ज्यादा है। तो इसका मतलब इस पानी के अंदर कार्बनिक पदार्थ जैसे कि सीवेज, कचरा, फूड वेस्ट, डिकेयिंग, प्लांट मैटर यह बहुत ज्यादा है। 

CPCB के रिपोर्ट में क्या बताया गया। गंगा के गंदगी का कारण?

राष्ट्रीय हरित अधिकरण को सौंप गई अपने रिपोर्ट में (CPCB) ने कहा कि महाकुंभ के सभी निगरानी स्थान पर फेकल कोलीफार्म  बैक्टीरिया की मात्रा अधिकतम सीमा से अधिक है यह पानी का स्वच्छता मापने का दूसरा कारण था।

फेकल कोलीफार्म एक प्रकार का बैक्टीरिया है, जो मनुष्य और पशुओं के मल या शौच में पाया जाता है। मानव मल मे  फेकल कोलीफार्म बैक्टीरिया के उच्च मात्रा होती है। यही कारण है कि यह जल की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए एक अच्छा संकेतक है।

वर्ष 2004 में शहरी विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति में कहा था, कि  फेकल कोलीफार्म कवांछनीय स्टार 500 mpn प्रति 100ml है। तथा अधिकतम स्तर 2.500mpn प्रति 100ml है।

Mpn का तात्पर्य सर्वाधिक संभावित संख्या है। यह मैप का एक मानक है।

इकाई mpn प्रति 100ml है स्नान के लिए पानी सुरक्षित होने के लिए मल में कोलीफार्म की मात्रा 2500 mpn प्रति 100 ml से अधिक नहीं होनी चाहिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक अधिक सख्त है उनका कहना है कि पीने योग्य जल में पर 100 ml फेकल कोलीफार्म की 0 mpn होना चाहिए।

आदर्शतः यह बैक्टीरिया पानी में बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।

लेकिन सबसे खराब स्थिति में भी सुरक्षित रूप से गिरावट के लिए हम 2500 की सीमा पर ही निर्भर रहेंगे।

महाकुंभ में मल में कॉलीफॉर्म की मात्रा कितनी थी। 

CPCB की रिपोर्ट में क्या निकला?

  • 20 जनवरी का संगम में यह 49.000 mpn पर 100 ml पाया गया।
  •  संगम के ठीक पहले यमुना नदी के जल में 33.000 mpn पर 100 ml पर पाया गया।
  • 4 फरवरी को गंगा नदी के शास्त्री पुल पर या 11000 mpn था। और संगम पर 7900 mpn था।

“यह जानकारी मिली CPCB की रिपोर्ट के अंदर”

महाकुंभ के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए सरकार ने क्या किया?

महाकुंभ के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए सरकार ने कई बार ताजा पानी छोड़ा था ताकि पॉल्यूशन को काबू किया जा सके उन्होंने गंगा को साफ नहीं किया। उसको को अस्थाई रूप से छुपानी तथा उन्हें पतला करने के लिए नदी में स्वच्छ पानी छोड़ दिया गया नदी में बहने वाली सीवेज नालियां फेकल कोलीफार्म का स्रोत है जैसे जोंडवाल नाला जहां मल में कॉलीफॉर्म का स्टार 92 लाख mpn पर 100 ml था इसी प्रकार राजापुर नाला और सैलरी नाले पर स्टार 34 लाख mpn से अधिक था।

प्रयागराज में गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार कई कदम उठाए है । जिनमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (stp) का निर्माण खुले नाले को बंद करना और गंगा के किनारे बसे गांवों को ठोस एवं तरल अवशिष्ट प्रबंधन योजना शामिल है।

कुछ प्रमुख कदम गंगा के पवित्र जल के लिए 

सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (S.T.P) का निर्माण

प्रयागराज में गंगा नदी में गिरने वाले सीवेज को साफ करने के लिए कई stp बनाए गए हैं।

खुले नालों को बंद करना

गंगा में सीधे गिरने वाले खुले नाले को बंद करके उनके पानी को stp में भेजा जा रहा है।

गंगा के किनारे बसे गांव में ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन योजना।

गंगा के किनारे बसे गांव में ठोस और तरल अपशिष्ट को सुरक्षित तरीके से प्रबंध करने के लिए योजनाएं शुरू की गई है।

जल की गुणवत्ता पर निगरानी

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गंगा और यमुना नदी के पानी की गुणवत्ता का लगातार निगरानी कर रहा है। गंगा के प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

“हाल ही में सरकार के गंगा प्रदूषण पर यही कुछ फैसला जारी किया गया है

गंगा के प्रदूषण के जांच के लिए जब NGT को बुलाया तो क्या हुआ?

NGT का फुल फॉर्म है नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जो पार्लियामेंट के एक्ट से बनी हुई एक बॉडी है NGT ने उत्तर प्रदेश के पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से पूछा कि क्या यह पानी सेफ है। तो उसने जवाब दिया कि एक पुल छोड़ के बाकी सब जगह पर गंगा और यमुना का पानी नहाने लायक है। जब एनजीटी ने सबूत मांगा तो रिपोर्ट के तौर पर पुराने वॉटर सैंपल की रिपोर्ट पकड़ा दी गई उन्हें यह सैंपल्स महाकुंभ शुरू होने के पहले के 12 जनवरी के थे यूपी पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की 250 पेज की रिपोर्ट में कहीं भी फिजिकल कॉलीफॉर्म की कोई जानकारी नहीं थी। 20 फरवरी को एनजीटी ने इस बात पर यूपी पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को फटकार भी लगे और पूछा कि यह नया डाटा ही नहीं है। तो हमारा टाइम क्यों वेस्ट कर रही हो। तो यूपी पॉल्यूशन बोर्ड ने कहा कि हमारे पास रीसेंट वाटर सैंपल है, और जल्द ही इन पर बेस्ट रिपोर्ट भी आ जाएगी किस आधार पर इन्होंने कहा कि गंगा का पानी नहाने लायक है यूपी पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड पर कई आरोप लगा है। गलत मेथड करके झूठ रिपोर्ट देने पर इसके बाद वाराणसी और बनारस यूनिवर्सिटी ने भी सैंपल लिए और रिजल्ट में अंतर देखने को मिला।

“यही कुछ कार्रवाई हुई NGT के आने के बाद”

महाकुंभ के बाद क्या रिपोर्ट सामने आई?

CPCB के रिपोर्ट के अनुसार भारत में होने वाली सभी जलजनित बीमारियों में से लगभग 70% नदियां के जल

प्रदूषण के कारण होती है ।

महाकुंभ के बाद भी ऐसे खबरे आई है । दिल्ली के इंद्र प्रस्थ 

अपोलो अस्पताल के 1 वरिष्ठ क्लास 10th ने अंत को बताया कि कुंभ से लौटने वाले लोगों को चिकित्सा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है लोग दस्त और उल्टी जैसे लक्षणों के साथ अस्पताल पहुंचे।

कुछ लोगों को तो बुखार भी हुआ जिसका कारण ज्ञात नहीं था डॉक्टर ने बताया कि महाकुंभ से  लौटने वाले लोगों को सांस लेने की समस्या भी काफी आम है।

यह सरकार के लिए शर्मनाक है,कि उन्होंने करोड़ों लोगों को मूर्ख बनाया उनके झूठ बोला और दावा किया कि पानी पीने और नहाने के लिए उपयुक्त है।

जनवरी 2023 में CPCB केआंकड़ों में क्या पता चला।

जनवरी 2023 में CPCB के आंकड़ों में पता चला की गंगा में 70% स्थान पर फिजिकल कॉलीफॉर्म का इस स्तर अधिकतम सीमा से अधिक हो गया है। सीवेज और फैक्ट्रियां अपशिष्ट गंगा में बह रहा है नदियों को साफ करने के समय सीमा को डाला जा रहा है। इससे पहले उन्होंने 2020 तक गंगा को साफ करने का वादा किया था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका 2022 में कहां वह भी नहीं हुई यह उन नदियों को साफ करना है तो फैक्ट्री से निकलने वाले प्रदूषण को रोकना होगा।

G.B अग्रवाल कोन थे इन्होंने गंगा के बचाने के लिए क्या किया।

GB अग्रवाल IIT कानपुर में प्रोफेसर थे और बाद में स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद बन गए उन्होंने अपना पूरा जीवन गंगा नदी को समर्पित कर दिया । उनके प्रयासों के कारण ही गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिया गया 2018 में 86 साल की उम्र में उन्होंने गंगा के लिए 111 दोनों का भूख हड़ताल की थी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई बार पत्र लिखकर अनुरोध किया कि वह उनकी पुकार सुने और गंगा को बचाए लेकिन सरकार चुप रही और अतः 111 दिन बाद जब उनका निधन हुआ तो प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया।

प्रयागराज गंगा प्रदूषण के कुछ कारण।

प्रयागराज में गंगा के प्रदूषण मुख्ता सीवेज और औद्योगिक कचरे के सीधे नदी में डाले जाने से होता है साथ ही कुंभ जैसे आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के स्नान से भी पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

सीवेज और औद्योगिक कचरा

प्रयागराज जैसे शहरों में अनौपचारिक सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट सीधे गंगा में छोड़े जाते हैं जिसमें पानी में बैक्टीरिया और हानिकारक रसायनों की मात्रा बढ़ जाती है।

कुंभ जैसे आयोजन का प्रभाव

कुंभ मेले के दौरान बड़ी संख्या में लोग गंगा में स्नान करते हैं जिसमें पानी में मानव अपशिष्ट और अन्य गंदगी की मात्रा बढ़ जाती है।

 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की समस्या

कुछ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ठीक से काम नहीं करते हैं जिसमें गंदा पानी बिना उपचार के ही गंगा में छोड़ा जाता है।

कृषि अपवाह

कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाली रसायनों और उर्वरकों का पानी में माध्यम से नदी में पहुंचना भी प्रदूषण का एक कारण है।

अस्थि विसर्जन

अंतिम संस्कार की चिताओं से आशिक रूप से जले हुए या बिना जले हुए समूह के अवशेषों को नदी में डाला जाना भी प्रदूषण में योगदान करता है।

नदी के किनारे कूड़े का ढेर

नदियों के किनारे कूड़े के देर भी नदी के प्रदूषण को बढ़ाते हैं।

पानी में हानिकारक बैक्टीरिया

गंगा में बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया और जहरीले पदार्थ का उच्च स्तर भी पाया गया है।

“यही  कुछ निम्न कारण जो  प्रयागराज के गंगा को अत्यधिक प्रदूषित कर रहे हैं”

गंगा सफाई योजना के तहत क्या-क्या है

गंगा नदी को साफ करने के लिए कई योजनाएं चलाई गई है जिनमें गंगा एक्शन प्लान नमामि गंगे कार्यक्रम और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन शामिल है।

 गंगा एक्शन प्लान

  • साल 1985 में पर्यावरण और वन मंत्रालय ने गंगा एक्शन प्लान शुरू किया था।
  •  इसका मकसद नदी में प्रवेश करने वाले प्रदूषण को कम करना था।
  • इस योजना के तहत घरेलू सीवेज और औद्योगिक कचरे को रोकने मोड़ने और उपचार करने का काम किया गया।

नमामि गंगे कार्यक्रम

  • साल 2014 में केंद्र सरकार ने नमामि गंगे कार्यक्रम शुरू किया था।
  • यह एकत्रित संरक्षण मिशन है।
  • इसका मकसद गंगा नदी के प्रदूषण को कम करना और उसे पुनरूद्धार करना है।
  • इस कार्यक्रम के तहत अपशिष्ट जल उपचार ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नदी तट प्रबंधन वनरोपण जैव विविधता संरक्षण और जनभागीदारी जैसे काम किया जा रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन

  • राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन में गवर्निंग काउंसिल और कार्यकारी समिति होती है। 
  • इस दोनों की अध्यक्षता ( NMCG ) के महानिदेशक करते हैं।

 निष्कर्ष

गंगा की हालत इस वक्त बहुत खराब हो गई है प्रयागराज के अलावा कई जगह के गंगा काफी गंदा है इसमें सरकार को कड़ा फैसला लेना चाहिए। ताकि गंगा साफ और सुंदर दिखने लगे।

इसमें कूड़ा करकट और गुरुत्वाकर्षण का सहारा लेकर एक बड़े कुंड में जमा कर लिया जाता है।

और गंगा में आने वाले मल फैक्ट्री से आने वाला गंदगी को रोकना चाहिए।

“इसका सही मायने में हल सरकार ही निकल सकती है”

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