मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना की लाइब्रेरी में की पढ़ाई, दिवाकर सिंह बने समीक्षा अधिकारी

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मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना की लाइब्रेरी में की पढ़ाई, दिवाकर सिंह बने समीक्षा अधिकारी


चित्रकूटः जिसके सपनों में उड़ान होती है, वही आसमान छूता है. यह पंक्ति चित्रकूट के एक साधारण से घर में जन्मे दिवाकर सिंह की कहानी को पूरी तरह बयां करती है. सीमित संसाधनों,पारिवारिक जिम्मेदारियों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद दिवाकर ने वह कर दिखाया,जो कई युवाओं का सपना होता है. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रतिष्ठित परीक्षा में समीक्षा अधिकारी के पद पर 29 वीं रैंक हासिल कर उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार,बल्कि पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया है.

पिता किसान, बड़े भाई का उठा साया

दिवाकर सिंह कर्वी के बाबूपुर पहाड़ी गांव के निवासी हैं, उनके पिता राजबहादुर एक साधारण किसान हैं, जिनकी आमदनी से घर का गुजारा मुश्किल से चलता था. लेकिन कुछ सालों तक बड़े भाई का सहारा था, जो अध्यापक के पद में तैनात थे. लेकिन कुछ साल पहले उनकी मौत हो गई थी. जिसके बाद घर की स्थिति और खराब हो गई थी. ऐसे हालात में पढ़ाई जारी रखना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन दिवाकर ने हार नहीं मानी,उन्होंने बिना किसी महंगी ऑनलाइन कोचिंग या बड़े संस्थान की मदद के अपनी मेहनत और नि शुल्क मुख्यमंत्री अभ्युदय नि शुल्क कोचिंग में पढ़ाई के दम पर यह मुकाम हासिल कर लिया है.

जैसे ही उनकी चयन की खबर सामने आई परिवार में खुशी का माहौल छा गया, गांव में लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई देने लगे. वहीं जब दिवाकर अपनी लाइब्रेरी पहुंचे तो वहां का नजारा देखने लायक था.उनके साथियों ने फूल-मालाओं से उनका जोरदार स्वागत किया है,और बधाई देने लगे.

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना की लाइब्रेरी में की पढ़ाई

वही दिवाकर सिंह ने अपनी सफलता के बारे में लोकल 18 को बताया कि उन्होंने 12वीं तक की शिक्षा कर्वी के सरस्वती विद्या मंदिर से पूरी की है. इसके बाद उन्होंने प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू संस्थान से बीटेक किया, इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैने सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की और अपने जिले में मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के तहत संचालित निशुल्क कोचिंग, लाइब्रेरी को अपना मुख्य सहारा बनाया है.  रोजाना 6 से 7 घंटे लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई करते थे. लेकिन मेरी जिम्मेदारियां यहीं खत्म नहीं हुई थीं.अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए मै शाम को बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाता था.और वही मेहनत आज मेरी सफलता की कहानी बनी है.

एसडीएम बना है सपना

उन्होंने आगे की जानकारी में बताया कि उन्होंने साल 2024 में पीसीएस परीक्षा पास कर इंटरव्यू तक पहुंच बनाई थी, लेकिन अंतिम चयन नहीं हो सका. इस असफलता ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बना दिया, उन्होंने दोबारा पूरी ताकत के साथ तैयारी शुरू की और इस बार समीक्षा अधिकारी के पद पर चयनित होकर अपनी मेहनत को साबित कर दिया. उन्होंने बताया कि अब वह फिर से पीसीएस का एग्जाम देंगे और अपने एसडीएम बनने वाले सपने को साकार करेंगे.



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