संरक्षण न हुआ तो मिट जाएगी ऐतिहासिक पहचान, घंटाघर से जुड़ी पानी सप्लाई की अनोखी व्यवस्था

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संरक्षण न हुआ तो मिट जाएगी ऐतिहासिक पहचान, घंटाघर से जुड़ी पानी सप्लाई की अनोखी व्यवस्था


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Bahraich Latest News : बहराइच में अंग्रेज शासनकाल का बना करीब 50 किलो वजनी पीतल नल आज भी इतिहास की गवाही दे रहा है. कभी यह नल ट्यूबवेल जैसी तेज धार से राहगीरों की प्यास बुझाता था. अब पानी भले बंद हो चुका है, लेकिन इसकी मजबूत बनावट और रोचक कहानी इसे शहर की खास धरोहर बनाती है.

बहराइच : यूपी के बहराइच जिले में मौजूद पीतल का ऐतिहासिक नल अंग्रेज शासनकाल की यादों को आज भी जीवित रखे हुए है. करीब 50 किलो वजनी यह नल कभी ट्यूबवेल जैसी तेज धार से पानी देता था और राहगीरों की प्यास बुझाता था. समय के साथ पानी आना बंद हो गया, लेकिन इसकी बनावट और कहानी आज भी लोगों को रोमांचित करती है.

राहगीरों की प्यास बुझाने का था इंतजाम
अंग्रेज शासनकाल में सार्वजनिक सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए शहर में कई स्थानों पर पीतल के नलों की व्यवस्था की गई थी. घंटाघर परिसर में बनी पानी की टंकी से पाइपलाइन के जरिए इन नलों तक पानी पहुंचाया जाता था. उस दौर में यह व्यवस्था आधुनिक तकनीक का उदाहरण मानी जाती थी. राह चलते लोग इन नलों से ठंडा और तेज धार वाला पानी पीकर अपनी प्यास बुझाते थे.

ट्यूबवेल जैसी धार, सेकंडों में बुझती थी प्यास
इन पीतल के नलों की खासियत उनकी पानी की तेज धार थी. स्थानीय लोगों के अनुसार जब नल खोला जाता था तो पानी ट्यूबवेल की तरह तेजी से बहता था. कुछ ही सेकंड में घड़े और बर्तन भर जाते थे. यह सुविधा उस समय के हिसाब से बेहद उन्नत मानी जाती थी. आज भले ही पानी आना बंद हो चुका है, लेकिन नल अब भी मजबूती से खड़ा है और अपने गौरवशाली अतीत की कहानी कहता है.

मजबूत बनावट और अनोखी तकनीक
करीब 5 से 6 फुट ऊंचाई वाले इन नलों को पूरी तरह पीतल से तैयार किया गया था. समय के साथ सड़क की पटरियों के ऊंचा होने के कारण अब इनकी ऊंचाई घटकर 3 से 4 फुट रह गई है. पूरा ढांचा ऊपर से नीचे तक पीतल का बना है, जो अंग्रेजों की तकनीकी दक्षता को दर्शाता है. एक बटन या वाल्व घुमाते ही पानी झरने की तरह बहने लगता था. यह उस दौर की उन्नत इंजीनियरिंग का प्रमाण है.

शहर के अलग-अलग हिस्सों में अब भी मौजूद
नगर पालिका क्षेत्र में ऐसे कई नल अब भी अलग-अलग स्थानों पर देखे जा सकते हैं. मीरा खेल पूरा मंदिर के पास, गुदड़ी में छाया कुआं के पास और भाजपा के पूर्व विधायक मुकुट बिहारी वर्मा के आवास से पहले ऐसे नल लगे हुए हैं. हालांकि समय के साथ कुछ नलों के हिस्से चोरी हो गए या क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. फिर भी जो बचे हैं, वे शहर की ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखे हुए हैं.

संरक्षण नहीं हुआ तो मिट सकती है पहचान
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इन ऐतिहासिक नलों की समय रहते देखरेख नहीं की गई तो इनका अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है. नगर पालिका को चाहिए कि इन्हें धरोहर घोषित कर संरक्षित करे. यह सिर्फ एक नल नहीं, बल्कि शहर के इतिहास का जीवंत प्रमाण है. आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि वे भी अपने अतीत को करीब से जान सकें.



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