हरीश राणा का पैसिव यूथिनिसिया से दम निकलने में कितना वक्त लगेगा? समझें
नई दिल्ली/गाजियाबाद : सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी के बाद निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के लिए हरीश राणा (Harish Rana) को एम्स में शिफ्ट किया गया है. भारत में अदालत की अनुमति से इच्छामृत्यु का यह पहला मामला माना जा रहा है. करीब 13 साल से वेजिटेटिव स्टेट में जीवन बिता रहे हरीश के मामले में अब डॉक्टरों की निगरानी में प्रक्रिया अपनाई जाएगी, ताकि उन्हें लंबे समय से चल रहे असहनीय कष्ट से मुक्ति मिल सके.
13 साल पहले हुई गंभीर हेड इंजरी के बाद से हरीश राणा (Harish Rana Euthanasia) आज तक होश में नहीं आ सके हैं. उनका ब्रेन फंक्शन वापस नहीं लौटा है और डॉक्टरों के मुताबिक उनके सामान्य होने की संभावना बेहद कम है. परिवार लगातार उनकी देखभाल कर रहा है, लेकिन इस लंबी लड़ाई में मरीज के साथ-साथ पूरा परिवार भी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्ट झेल रहा है.
इच्छामृत्यु यानी यूथेनेशिया (Euthanasia) को लेकर अक्सर ऐसे मामलों में बहस तेज हो जाती है. आम तौर पर इसमें व्यक्ति खुद अपने जीवन को समाप्त करने की इच्छा जाहिर करता है, लेकिन भारत में एक्टिव यूथिनिसिया यानी इंजेक्शन देकर जीवन खत्म करना गैरकानूनी है. यही वजह है कि देश में इसे अनुमति नहीं दी गई है, क्योंकि इसके दुरुपयोग की आशंका भी बनी रहती है. हालांकि दुनिया के कुछ देशों जैसे नीदरलैंड, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में एक्टिव यूथिनिसिया को कानूनी मान्यता दी गई है. वहां तय कानूनी प्रक्रिया के तहत मरीज को इंजेक्शन देकर मृत्यु दी जाती है.
भारत में इस मुद्दे पर सबसे चर्चित मामला मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग का रहा. वह वर्षों तक वेजिटेटिव स्टेट में रहीं, यानी उनका ब्रेन काम नहीं कर रहा था, लेकिन शरीर के अन्य अंग काम कर रहे थे. इस केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सख्त शर्तों के साथ पैसिव यूथिनिसिया की अनुमति दी.
पैसिव यूथिनिसिया क्या है?
पैसिव यूथिनिसिया में लाइफ सपोर्ट या कृत्रिम पोषण (न्यूट्रिशन) को हटाया जाता है, जिससे धीरे-धीरे मृत्यु हो जाती है, लेकिन यह प्रक्रिया भी आसान नहीं होती. इसमें कोर्ट की अनुमति, डॉक्टरों की टीम द्वारा जांच और अस्पताल की रिपोर्ट जरूरी होती है.
एम्स (AIIMS) के पूर्व डायरेक्टर और सीताराम भारतीया इंस्टीट्यूट के कंसलटेंट डॉ. एम.सी. मिश्रा के अनुसार, ऐसे मामलों में हर कदम बेहद सावधानी से उठाया जाता है. डॉक्टर मरीज की स्थिति का आकलन कर कोर्ट को रिपोर्ट देते हैं और उसी के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होती है. एम्स के ट्रॉमा सेंटर में कई ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां हेड इंजरी के बाद मरीज लंबे समय तक बेहोश होते हैं. कई बार परिवार उनकी देखभाल करने में असमर्थ हो जाता है और कुछ मरीजों को छोड़ भी दिया जाता है. ऐसे में कुछ एनजीओ और सामाजिक संगठन आगे आकर इनकी देखभाल करते हैं. हरीश राणा के मामले में यह कहना मुश्किल है कि उनकी सांसें कब तक चलेंगी. अगर पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो न्यूट्रिशन बंद करने के बाद भी 15 दिन, एक महीना या उससे ज्यादा समय लग सकता है.
समाज में इस मुद्दे पर अलग-अलग नजरिए हैं. जैन समुदाय में संथारा जैसी परंपरा का जिक्र भी होता है, जिसमें व्यक्ति स्वेच्छा से भोजन त्यागकर धीरे-धीरे मृत्यु को स्वीकार करता है. कुल मिलाकर, इच्छामृत्यु का सवाल सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि इंसानियत, संवेदना और नैतिकता से जुड़ा हुआ है, जहां हर फैसला बेहद सोच-समझकर लेना पड़ता है.