हाथी पर बैठकर देखते थे महाराज, भरत मिलाप की यह लीला सदियों से जारी, जानें सच
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वाराणसी के नाटी इमली में भरत मिलाप का ऐतिहासिक महत्व है. 482 साल पहले चित्रकूट रामलीला समिति द्वारा इस रामलीला की शुरुआत की गई थी. इस रामलीला से जुड़ी कई खास बातें हैं और काशी राज परिवार का इस लीला से रिश्ता सदियों पुराना है. 228 साल पहले इस परंपरा की शुरुआत हुई थी.
वाराणसी के नाटी इमली में भरत मिलाप का ऐतिहासिक महत्व है. उस समय के तत्कालिक काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह ने भरत मिलाप से खुद को जोड़ा था. उस समय वह हाथी पर सवार होकर इस लीला को देखने आते थे. 1796 में उनकी शुरू की गई यह परंपरा आज भी कायम है.

सीनियर जर्नलिस्ट हिमांशु राज पांडेय ने बताया कि महाराजा उदित नारायण 1814 तक काशी राज परिवार में गद्दी पर थे. उनके बाद भी इस गद्दी पर बैठने वाले राजाओं ने इस परंपरा को कायम रखा है. शुक्रवार को अनंत नारायण सिंह 228वें साल में इस लीला में शामिल होंगे.

वे भी पूरे शाही ठाठ-बाठ के साथ हाथी पर सवार होकर इस लीला में आते हैं. उनके आगमन के साथ ही “हर-हर महादेव” के जयघोष से उनका स्वागत होता है और फिर उन्हें सलामी दी जाती है.

इसके बाद वे हाथी पर बैठकर ही लीला स्थल का भ्रमण करते थे. फिर पूरी भरत मिलाप के इस लीला को भी वे हाथी पर बैठकर ही निहारते हैं. यह क्षण काफी अद्भुत होता है.

लीला से जुड़े लोगों के अनुसार, काशी नरेश विभूति नारायण सिंह साल 2000 में बीमार पड़ गए थे. डॉक्टरों ने उन्हें बाहर आने-जाने से मना भी किया था, लेकिन इसके बावजूद वे अचानक हाथी पर सवार होकर इस लीला में पहुंच गए और परंपरा को कायम रखा.

काशी के नाटी इमली में भरत मिलाप की दो मिनट की लीला देखने के लिए लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं. भक्तों का मानना है कि यहां स्वयं प्रभु श्री राम के दर्शन होते हैं. भगवान राम के अनन्य भक्त मेघाभगत ने इसकी शुरुआत की थी.