होली पर इस गांव में निभाई जाती है अनोखी परंपरा, तख्त पर सवार होकर निकलती यात्रा, नुकीले औजारों से होता खेल

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होली पर इस गांव में निभाई जाती है अनोखी परंपरा, तख्त पर सवार होकर निकलती यात्रा, नुकीले औजारों से होता खेल


मेरठ: भारतीय संस्कृति की अगर बात की जाए तो आपको प्रत्येक गांव, शहर में अलग-अलग तरह की परंपराएं सुनने को‌ मिलेगी, जिसे लोग आज भी निभाते हुए आ रहे हैं. कुछ इसी तरह का नजारा मेरठ से 15 किलोमीटर दूर बिजौली गांव में भी देखने को मिलता है, जहां धुलेंडी यानि रंग वाली होली के दिन प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए परंपरा अनुसार तख्त यात्रा निकाली जाती है, जिसमें ग्रामीण बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

500 सालों से चली आ रही परंपरा

गांव के रहने वाले नवनीत बताते हैं कि उनके गांव बिजौली में 500 सालों से तख्त परंपरा का संचालन किया जा रहा है, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग और युवा सभी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए दिखाई देते हैं. उन्होंने कहा कि भले ही विभिन्न स्थानों पर जात-पात की बात होती है, लेकिन उनके गांव में सभी जाति धर्म के लोग सद्भाव के साथ रहते हैं. साथ ही धुलेंडी पर निकलने वाली इस यात्रा में हिंदू मुस्लिम सभी लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

इस तरह हुई थी परंपरा की शुरुआत

गांव के रहने वाले रजनीश त्यागी बताते हैं कि राजा रणविजय सिंह के शासनकाल में बिजौली में भयंकर, अकाल मृत्यु और महामारी आपदाओं का दौर आया था. इसी दौरान एक तपस्वी बाबा गंगापुरी आए थे. उन्होंने राजा रणविजय को यह तख्त परंपरा बताई थी. जैसे ही तख्त परंपरा का पालन किया गया.

उसके बाद से भगवान की दिव्य कृपा गांव पर बरसने लगी. तब से कोई भी महामारी गांव में प्रवेश नहीं करती है. उन्होंने बताया कि एक बार तख्त परंपरा को नहीं निभाया गया था, तब गांव में भयंकर बीमारी देखने को मिली थी. उसके बाद से सभी लोग इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं.

खुशी से निभाते हैं हर कोई परंपरा 

अनिल बताते हैं कि परंपरा को निभाने के लिए युवाओं में काफी जिज्ञासा देखने को मिलती है. भले ही लोहे की नुकीली औजारों के माध्यम से उनके शरीर के विभिन्न हिस्सों को बेधा जाता हो, लेकिन फिर भी बाबा की कृपा से सभी लोग इसमें प्रतिभाग करते हैं. उन्होंने बताया कि खास बात यह है कि दिव्य शक्ति का ही आशीर्वाद से किसी भी व्यक्ति को कोई भी नुकसान नहीं होता है. उन्होंने बताया कि गांव में निकलने वाली इस यात्रा का समापन ग्रामीण क्षेत्र में ही बनी बाबा की समाधि पर हो जाता है.

बताते चले कि इस परंपरा के दौरान नुकीले औजारों से युवाओं को बेधने के बाद तख्त पर घुमाया जाता है, जिसमें ग्रामीण कंधों पर अपने तख्त को लेकर इस यात्रा के दौरान दिखाई देते हैं. इसमें गांव ही नहीं, बल्कि दूर-दराज से रिश्तेदार भी शामिल होने के लिए पहुंचते हैं.



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