बलिया की तपोभूमि से तिरुवन्नामलै तक का सफर, भक्तों के जीवन में लाए चमत्कारी बदलाव, जानें कौन हैं योगी रामसुरत कुमार

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बलिया की तपोभूमि से तिरुवन्नामलै तक का सफर, भक्तों के जीवन में लाए चमत्कारी बदलाव, जानें कौन हैं योगी रामसुरत कुमार


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Ballia News: प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने कहा कि योगी रामसुरत कुमार गुरुराया की प्राथमिक शिक्षा गांव में और इंटरमीडिएट बलिया के राजकीय इंटर कॉलेज से प्राप्त कर उन्होंने 1941 में इलाहाबाद विश्…और पढ़ें

बलिया: यह धरती मोक्षदायिनी, भृगु नगरी या दर्दर क्षेत्र और बागी के नाम से प्रसिद्ध हैं. यहां एक से बढ़कर एक संत महात्माओं ने जन्म लिया है. यह धरती खुद में तप और साधना की महान परंपरा को संजोई हुई है. इसी पावन भूमि से भृगु मुनि को भी मोक्ष की प्राप्ति हुई थी. इसी में आज हम आपको योगी रामसुरत कुमार की रोचक कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्हें गुरुराया के नाम से भी जाना जाता है. योगी रामसुरत कुमार का जन्म 1918 में बलिया जिले के बैरिया तहसील अंतर्गत नरदरा गांव में हुआ था.

प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने कहा कि योगी रामसुरत कुमार गुरुराया की प्राथमिक शिक्षा गांव में और इंटरमीडिएट बलिया के राजकीय इंटर कॉलेज से प्राप्त कर उन्होंने 1941 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि भी प्राप्त कर ली थी. यही नहीं, इनका विवाह बिहार के बेगूसराय जिले की रामरंजनी देवी से हो गया था.

शादी के बाद इनकी चार संतानें हुईं. इसमें तीन बेटियां-यशोधरा, माया, वीणा और एक पुत्र अमिताभ शामिल हैं. संत बनने से पहले रामसुरत कुमार ने 1942 से 1953 तक कई विद्यालयों में शिक्षक के रूप में कार्यरत रह चुके हैं. इस दौरान उनका जीवन आरामदायक था, परिवार सुखी था, लेकिन भीतर कुछ अधूरा भी था.

सन 1953 की बात हैं जब इन्होंने सब कुछ त्याग कर और साधना की राह पर चल पड़े. यह स्वामी खपड़िया बाबा, रमण महर्षि और योगी अरविंद को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे. यह 1959 में दक्षिण भारत के तिरुवन्नामलै पहुँचे, जो तप और योग की भूमि मानी जाती है. यहीं पर कठोर तपस्या कर स्वयं को साधक से सिद्ध में बदल गए. इस महान योगी का पूरा जीवन ही सेवा, ध्यान और ईश्वर के नाम में लीन हो गया था.

बाबा ने अपने कृपा से हजारों भक्तों की मुरादे पूरी कर उनके दुखों का अंत किया था. इस महान योगी के शिष्यों में डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायाधीश और विदेशी भक्तों की लंबी चौड़ी सूची है. इनका हर उपदेश और आशीर्वाद लोगों के जीवन में चमत्कारी बदलाव लाता रहा, 20 फरवरी 2001 को जब गुरुराया ने शरीर त्याग दिए, तो उनकी जन्मभूमि नरदरा में उनकी स्मृति में एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया, यह मंदिर आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है.

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