Explainer: हिमाचल क्यों बेमौसम बर्फबारी, नार्थ इंडिया में क्यों रुक गया जाता हुआ मानसून
आखिर हिमाचल में अक्टूबर में बर्फ कैसे गिर गई? ये सवाल हर किसी की जुबान पर है. आखिर इस बार हिमाचल में बर्फबारी इतने पहले कैसे हो गई. वहीं उत्तर भारत में दो तीन दिनों से बदली और बारिश की झड़ी है. माना जा रहा है कि मौसम की गूगली ने जाते हुए मानसून को रोक दिया है. आखिर ये सब चल क्या रहा है. क्यों ऐसा हो रहा है.
सवाल – हिमाचल में ये बेमौसम बर्फबारी कैसे रही है. ये तो महीने भर से ज्यादा पहले ही यहां हो गई?
– इसकी मुख्य वजह पश्चिमी विक्षोभ यानि वेस्टर्न डिस्टर्बेंसेज का असामान्य तरीके से सक्रिय होना है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस समय एक सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ उत्तरी भारत के ऊपर बना हुआ है सामान्य तौर पर, पश्चिमी विक्षोभ अक्टूबर के मध्य या अंत में सक्रिय होता है, जब मध्य एशिया और यूरोप की ठंडी हवाएं दक्षिण की ओर बढ़ने लगती हैं. इस साल यह पैटर्न जल्दी शिफ्ट हो गया है. ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आने वाली नमी भरी हवाएं तेजी से उत्तरी भारत में दाखिल हो गईं.
इन हवाओं ने हिमालयी क्षेत्र में ठंडी और नम वायुओं का संगम बनाया – जिससे ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान शून्य से नीचे गिरा और बर्फबारी शुरू हो गई. मैदानी इलाकों में यही सिस्टम मूसलाधार बारिश लेकर आया.
सवाल – उत्तर भारत में कई दिनों से छायी बदली और बारिश क्या कह रही, क्या मानसून गया नहीं है?
– भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, इस पश्चिमी विक्षोभ ने मॉनसून के लौटने को भी धीमा कर दिया. यानी, जब दक्षिण-पश्चिम मानसून दक्षिण और पश्चिम भारत से हटने वाला था, तभी यह नया सिस्टम नमी को फिर से खींच लाया.
वैसे मौसम विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु असंतुलन का नतीजा है. पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिकों ने देखा है कि आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे उत्तरी गोलार्ध की जेट स्ट्रीम यानी ऊपरी हवाओं की दिशा और रफ्तार बदल रही है. जेट स्ट्रीम का असंतुलन मौसम के पैटर्न को अनियमित बना देता है. कभी ये हवाएं दक्षिण की ओर झुक जाती हैं, जिससे ठंडी और नम हवा जल्दी भारत की तरफ आने लगती है.

सवाल – जेट स्ट्रीम क्या होती है?
– जेट स्ट्रीम वायुमंडल की ऊपरी परतों में बहने वाली तेज़, संकरी हवा की धाराएं होती हैं, जो सामान्य तौर पर पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होती हैं. ये धाराएं मुख्य तौर पर क्षोभमंडल यानि ट्रोपोस्फीयर के ऊपरी हिस्से में, पृथ्वी की सतह से लगभग 11 से 13 किलोमीटर की ऊंचाई पर पाई जाती हैं.
आमतौर पर ये धाराएं 150 से 250 किलोमीटर प्रति घंटे तक की गति पकड़ सकती हैं. मुख्य तौर पर ये बेशक पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती हैं, लेकिन इनका प्रवाह अनियमित होकर लहरदार भी हो सकता है. ये ठंडी और गर्म हवाएं मिलकर बनाती हैं. दोनों के तापमान के अंतर से इसका जन्म होता है. ये कई तरह की होती हैं.
सवाल – उत्तर भारत में मॉनसून कब से कब तक रहता है. क्या इस बार ये लंबा खींच रहा है?
– आमतौर पर भारत में मॉनसून 1 जून से 30 सितंबर तक सक्रिय रहता है. पिछले कुछ वर्षों से इसका पैटर्न लंबा खिंचने वाला बन गया है. सितंबर के बाद भी कई बार नमी बनी रहती है. दक्षिण भारत, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से उठने वाले लो-प्रेशर सिस्टम (कम दबाव क्षेत्र) लगातार उत्तर की ओर बढ़ रहा है. इस वजह से मैदानों में बारिश हो रही है. कहा जा सकता है जाता हुआ मॉनसून रुक गया है.
सवाल – एल नीनो और समुद्री तापमान का इस पर क्या असर है?
– इस साल प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति बनी हुई है – यानी समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक है. एल नीनो का असर सिर्फ मानसून पर नहीं, बल्कि पोस्ट-मॉनसून सीजन पर भी पड़ता है. एल नीनो के कारण हिंद महासागर और अरब सागर में तापमान असमान रूप से बढ़ जाता है, जिससे नमी का प्रवाह असामान्य दिशा में चल पड़ता है और ये नमी उत्तर भारत तक पहुंच जाती है. इस साल, वैज्ञानिकों ने देखा कि एल नीनो के कारण हवा के ऊपरी स्तर पर नमी का दबाव बढ़ा, जो पश्चिमी विक्षोभ के साथ मिलकर बारिश और बर्फ को पहले ले आया.
सवाल – हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में मौसम का असर क्यों ज्यादा हो जाता है?
– हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों का भूगोल ऐसा है कि छोटी-सी मौसमी गड़बड़ी भी बड़े असर दिखा देती है. ऊंचाई में अचानक बदलाव, घाटियों में नमी का फंस जाना और हवा की दिशा में रुकावटें – ये सब माइक्रो-क्लाइमेट (स्थानीय मौसम प्रणाली) बनाते हैं, जो उत्तराखंड और हिमाचल जैसे राज्यों पर खूब असर डालते हैं.
सवाल – इस बेमौसम बारिश और बर्फबारी का खेती पर क्या असर होगा?
– हिमाचल और उत्तराखंड में सेब और आलू की फसल होती है. अक्टूबर में बर्फ पड़ने से सेब के पेड़ों को नुकसान हो सकता है, क्योंकि फलों के पकने का दौर चल रहा था. पहाड़ी गांवों में खेतों में आलू और सब्जियां अभी लगी हैं – ठंड से उनके सड़ने का खतरा है.