हे भगवान ऐसी औलाद किसी को न दें! गंगा स्नान कराने के बहाने मां को वृद्धाश्रम छोड़ आया बेटा, रुला देगी मीरा देवी की यह कहानी

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हे भगवान ऐसी औलाद किसी को न दें! गंगा स्नान कराने के बहाने मां को वृद्धाश्रम छोड़ आया बेटा, रुला देगी मीरा देवी की यह कहानी


जौनपुर: उम्र के उस पड़ाव पर जब इंसान अपने बच्चों के साथ सुकून के दो पल बिताने का सपना देखता है, वहीं किसी मां के हिस्से आया सिर्फ इंतज़ार और अकेलापन. यह कहानी है प्रयागराज की मीरा देवी की, जिनकी जिंदगी अब वृद्धाश्रम की दीवारों में सिमट गई है. मीरा देवी ने अपनी जिंदगी का हर लम्हा अपने बेटे के लिए जिया. पति का साथ जवानी में ही छूट गया था, फिर उन्होंने बेटे को पालने के लिए दिन-रात मेहनत की. कभी दूसरों के घरों में बर्तन मांजे, कभी कपड़े धोए, लेकिन बेटे की पढ़ाई में कमी नहीं आने दी. उनका सपना था कि बेटा एक दिन बड़ा आदमी बने और वही हुआ. बेटा अब दवाओं का बड़ा व्यापारी है, शहर में नाम है, पैसा है, शान है, लेकिन उस शान के बीच मां के लिए जगह नहीं बची.

मीरा देवी की आंखें आज भी उस दिन को नहीं भूल पातीं. जब बेटे ने कहा  कि मां, चलो गंगा स्नान के लिए चलते हैं. वह खुश हो गईं. सालों बाद बेटे के साथ बाहर निकलने का मौका मिला था. उन्होंने नई साड़ी पहनी, माथे पर लाल बिंदी लगाई और बेटे के साथ गाड़ी में बैठ गईं. पर गंगा किनारे नहीं, वृद्धाश्रम के दरवाजे पर गाड़ी रुकी. बेटा बोला ‘मां, आप यहीं थोड़ी देर बैठिए, मैं दवा की दुकान से होकर आता हूं’. घंटों बीत गए, शाम हो गई, लेकिन बेटा नहीं लौटा. तब वृद्धाश्रम की देखरेख करने वाली महिला ने कहा कि बेटा तो चला गया मां, अब यही आपका घर है.

मीरा देवी की आंखों से आंसू बह निकले और उन्होंने आसमान की ओर देखा जैसे भगवान से पूछ रही हो क्या यही है बेटे को पालने की सजा. आज मीरा देवी वृद्धाश्रम में रह रही हैं. उनके पास पुराने दिनों की यादें हैं. वह बचपन जब बेटा उनकी गोद में सोया करता था, जब ठंड में वह उसके लिए ऊनी स्वेटर बुनती थीं, लेकिन अब वह बेटा दूर है, शायद अपनी नई जिंदगी में मां के लिए जगह नहीं बची. वृद्धाश्रम की दीवारों के बीच मीरा देवी कई बार अपने कमरे में बैठकर कहती है कि बेटे को कभी ठंडी हवा भी लग जाती थी, तो मैं रातभर उसके सिरहाने बैठी रहती थी… पर आज मैं बीमार हूं, तो पूछने वाला कोई नहीं.

उनकी यह कहानी सिर्फ एक मां की नहीं, बल्कि उन तमाम माओं की दास्तान है, जिन्हें आखिरी पड़ाव में अपने ही बच्चों से दूरी मिलती है. यह समाज के लिए एक आईना है, जहां हर कोई अपने माता-पिता को भगवान कहता है, लेकिन जब वक्त आता है साथ निभाने का, तो वही भगवान अकेले छोड़ दिए जाते हैं. मीरा देवी की आंखों में आज भी उम्मीद बाकी है. शायद कभी उसका बेटा लौट आए, कहे “मां, चलो घर चलें. पर अब वह जानती हैं, घर सिर्फ दीवारों का नाम नहीं होता, घर वो होता है, जहां अपने हों. आखिरी पड़ाव पर मीरा देवी अकेली हैं… और हजार तनाव उनके साथ हैं.



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