क्या मुसलमान दिवाली मना सकते हैं? क्या कहता है इस्लाम..यहां जानें
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Aligarh latest News: मौलाना इफराहीम हुसैन ने कहा कि दीपावली जैसे त्यौहार गैर-मुस्लिमों के धार्मिक अक़ीदे और जज़्बात से जुड़े हुए हैं.
अलीगढ़: भारत एक ऐसा देश है जहां हर धर्म और समुदाय के लोग मिलजुल कर रहते हैं. यहां सभी अपने-अपने त्योहारों को बड़े धूमधाम से मनाते हैं. जल्द ही देशभर में दीपावली का पर्व भी मनाया जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या मुस्लिम समुदाय के लोग भी इस दीपावली में शामिल हो सकते हैं या इसे मना सकते हैं? इस्लाम इसमें क्या कहता है और क्या इसकी इजाजत देता है? इसी सवाल का जवाब जानने के लिए लोकल 18 की टीम ने अलीगढ़ के मुस्लिम धर्म गुरु चीफ मुफ़्ती मौलाना इफराहीम हुसैन से खास बातचीत की.
इस्लाम में है मनाही
मौलाना इफराहीम हुसैन ने कहा कि दीपावली जैसे त्यौहार गैर-मुस्लिमों के धार्मिक अक़ीदे और जज़्बात से जुड़े हुए हैं. इसलिए, मुसलमानों के लिए ऐसे धार्मिक पर्वों में शामिल होना या उन्हें मनाना जायज़ नहीं है. इस्लाम में हर धर्म के मानने वालों को अपने-अपने अक़ीदे और जज़्बात के अनुसार चलने का अधिकार है, लेकिन मुसलमान केवल उन्हीं कामों को कर सकते हैं जिनकी अनुमति इस्लाम में दी गई है. उन्होंने आगे कहा कि अगर बात आपसी और सामाजिक भाईचारे की हो, तो उसमें कोई मनाही नहीं है. सामाजिक संबंधों के तहत एक-दूसरे से मिलना-जुलना, व्यवहार रखना या सामान्य तौर पर खाना-पीना जायज़ है. बशर्ते कि वह किसी धार्मिक आयोजन या पूजा से जुड़ा हुआ न हो.
धार्मिक त्योहारों में शामिल होना हराम
मौलाना ने कहा कि दीपावली जैसे धार्मिक त्यौहारों में शामिल होना या उन्हें मनाना इस्लामी नज़रिये से नाजायज़ है और हराम है. क्योंकि यह गैर-मुस्लिमों की धार्मिक रस्मों से जुड़ा हुआ है. हां आपसी सौहार्द और सामाजिक उद्देश्य से सामान्य व्यवहार करना या मेलजोल रखना इस्लाम में मना नहीं किया गया है. इसीलिए धार्मिक रूप से मुसलमानो को दीपावली का पर्व मनाना या उसमें शामिल होना जायज नहीं है. जबकि सामाजिक सुहार्ध और भाई चारे के मकसद से मिला-जुला जा सकता है. इसकी इस्लाम मे मनाही नहीं है.