Parwal Kheti Tips: कम लागत, ज्यादा मुनाफा…, परवल की खेती किसानों के लिए बनी सोने की खान! हर एकड़ से डेढ़ लाख की कमाई

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Parwal Kheti Tips: कम लागत, ज्यादा मुनाफा…,  परवल की खेती किसानों के लिए बनी सोने की खान! हर एकड़ से डेढ़ लाख की कमाई


Parwal Kheti Tips: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के किसान तेजी से पारंपरिक खेती से हटकर नगदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. पहले जहां किसान गेहूं, धान और गन्ने जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे, वहीं अब वे सब्जी उत्पादन को अपनी आय का प्रमुख स्रोत बना रहे हैं. इनमें परवल की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. कम लागत और अधिक मुनाफे के कारण परवल की खेती न केवल किसानों की आमदनी बढ़ा रही है बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रही है.

गर्मी हो या सर्दी, परवल की मांग पूरे साल बनी रहती है. यह न केवल सब्जी के रूप में उपयोग होती है, बल्कि इसकी मिठाई भी लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है. यही कारण है कि बाजारों में इसकी कीमत अपेक्षाकृत स्थिर रहती है और किसानों को हर मौसम में मुनाफा मिलता रहता है. परवल की खेती में बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर बहुत अधिक खर्च नहीं आता, जिससे किसानों को लागत के मुकाबले अधिक लाभ प्राप्त होता है.

लखीमपुर खीरी के किसान त्रिलोकी नाथ बताते हैं कि उन्होंने पिछले एक वर्ष से परवल की खेती शुरू की है और उन्हें इससे अच्छा मुनाफा हो रहा है. उनके अनुसार, एक एकड़ भूमि में परवल की खेती करने पर लगभग 1,00,000 तक का खर्च आता है. जिसमें बीज, जैविक खाद, सिंचाई, कीटनाशक और मजदूरी का खर्च शामिल है. वहीं, उत्पादन और बिक्री के बाद दो से ढाई लाख रुपए तक की आमदनी हो जाती है. इस प्रकार, प्रति एकड़ लगभग डेढ़ लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा किसानों को प्राप्त हो रहा है.

त्रिलोकी नाथ बताते हैं कि परवल की बेल तैयार करने के बाद उसे खेत में लगाया जाता है और फिर ‘मचान विधि’ से खेती की जाती है. इस विधि में पौधों को सहारा देकर बेलों को ऊपर चढ़ाया जाता है, जिससे फल जमीन पर नहीं गिरते और खराब नहीं होते. इससे न केवल फल की गुणवत्ता बेहतर रहती है बल्कि उत्पादन भी अधिक मिलता है.

वर्तमान में बाजारों में परवल 40 प्रति किलोग्राम की दर से बिक रहा है. यदि मौसम अनुकूल रहे तो यह कीमत 50 प्रति किलो तक पहुंच जाती है. परवल की फसल लगभग 10 महीने तक लगातार फल देती है, जिससे किसानों को लंबी अवधि तक आमदनी होती रहती है. साथ ही, यह फसल मौसम के उतार-चढ़ाव को भी काफी हद तक सहन कर लेती है, जिससे किसानों को नुकसान की संभावना बहुत कम रहती है.



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