रोहिल्ला शासन काल की ये धरोहरें, जो आज भी देती हैं इतिहास की गवाही, महाभारत और पांचाल से जुड़ी कहानी

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रोहिल्ला शासन काल की ये धरोहरें, जो आज भी देती हैं इतिहास की गवाही, महाभारत और पांचाल से जुड़ी कहानी


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Pilibhit News: यूपी का पीलीभीत शहर आज अपने पीलीभीत टाइगर रिजर्व के नाम से देश-दुनिया में मशहूर है, लेकिन ये शहर अपने आप में काफी ऐतिहासिक भी माना जाता है. यहां की तमाम लोककथाओं के अनुसार तो लोग पीलीभीत को महाभारत काल व पांचालों से भी जोड़कर देखते हैं.

सन 1748 में अली मोहम्मद खां की मौत के बाद रोहिल्लों के सरदार बनने पर हाफिज रहमत खां ने बरेली के बजाए पीलीभीत को रोहिलखंड की राजधानी घोषित कर दिया. इसके बाद से ही शहर में तमाम मस्जिदों के निर्माण शुरू किए गए. रोहिलखंड की राजधानी बनने के बाद पीलीभीत में जामा मस्जिद का निर्माण कराया गया था. यहां की जामा मस्जिद दिल्ली की जामा मस्जिद का प्रतिरूप है. जानकार बताते हैं कि हाफिज रहमत खां का जामा मस्जिद से विशेष लगाव था. वो चाहता था कि जो दिल्ली की जामा मस्जिद न देख पाए, उसे पीलीभीत की जामा मस्जिद देखकर वहां की खूबसूरती का अहसास हो, इसलिए उसने पीलीभीत में भी हूबहू मस्जिद बनवाई.

gaurishankar mandir

शहर में यदि धार्मिक धरोहरों की बात आती है तो उसमें जामा मस्जिद के साथ ही गौरीशंकर मंदिर का भी जिक्र जरूर आता है. दरअसल हिन्दू समुदाय की आस्था गौरीशंकर मंदिर में अधिक होने के चलते जामा मस्जिद निर्माण के बाद हाफिज रहमत खां ने मंदिर के भव्य द्वार का भी निर्माण कराया था. ये द्वार आज भी गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल कायम करता है.

Bareilly gate

दरवाजे पर लगे शिलालेख के अनुसार, इस दरवाजे का निर्माण सूबेदार अली मोहम्मद खां ने सन 1734 में किया था. यह दरवाजा शहर के जेपी रोड पर स्थित है. सूबेदार ने इसके अलावा अन्य कई दरवाजों का निर्माण भी किया था, लेकिन रख-रखाव के अभाव में सभी दरवाजे अब काल के गाल में समा गए हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, दरवाजे का ऊपरी हिस्सा (छत) सन 1999 की एक दोपहर में टूट कर गिर गई थी. हाल में ही इसके जीर्णोद्धार की कवायद भी की गई थी, लेकिन वह भी अब ठंडे बस्ते में चली गई है.

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khakra bridge

हाफिज रहमत खां ने पीलीभीत के राजधानी बनने के बाद तमाम इमारतों के साथ खकरा पुल का भी निर्माण कराया था. ये पुल शहर से चंदोई समेत तमाम गांवों को जोड़ता है. हालांकि आज इस पुल की हालत थोड़ी जर्जर जरूर है, लेकिन आवाजाही के लिए हजारों की आबादी इसका ही उपयोग करती है.

hammam

शहर में आज जिस इमारत को पुराने अस्पताल (सीएमओ दफ्तर) के नाम से जाना जाता है. ठीक उसी स्थान पर ऐतिहासिक हमाम हुआ करता था. शहर के इतिहास पर अच्छी पकड़ रखने वाले रेहान के एक लेख के अनुसार, इस हमाम का निर्माण सन 1750 के आसपास किया गया था, लेकिन सन 1936 आते-आते इस इमारत ने खंडहर का रूप ले लिया था. वहां पर अब जिला अस्पताल बना दिया गया है. हालांकि यह हमाम सन 1977 तक लोगों के काम आता था, लेकिन बाद में यह भी एक इतिहास मात्र बनकर रह गया.

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