ताजमहल से भी पुराना है आगरा का अकबर का चर्च, कई हमलों के बाद भी है आस्था का केंद्र, जानिए 400 साल पुराना इतिहास
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Akbar Church Agra: आगरा में स्थित अकबर का चर्च उत्तर भारत का पहला और ताजमहल से भी पुराना ईसाई चर्च माना जाता है. मुगल बादशाह अकबर ने इसका निर्माण 1599 में वज़ीरपुरा क्षेत्र में कराया था. यह चर्च अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का प्रतीक है. कई आक्रमणों और पुनर्निर्माण के बाद भी यह चर्च आज ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यटन महत्व बनाए हुए है, जहां क्रिसमस पर विशेष आयोजन होते हैं.
आगरा में स्थित अकबर का चर्च उत्तर भारत का पहला और सबसे पुराना चर्च माना जाता है. इसे मुगल बादशाह अकबर ने सन 1599 में आगरा के वजीरपुरा क्षेत्र में बनवाया था. आज भी यह चर्च पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. ईसाई धर्म के अलावा अन्य धर्मों के लोग भी यहां आते हैं. क्रिसमस के अवसर पर यहां बड़े धूमधाम से कार्यक्रम आयोजित होते हैं.

इतिहासकारों के अनुसार, इस चर्च का निर्माण पादरी जेसुइट जेवियर की देखरेख में हुआ था. इस चर्च के निर्माण यानी बनने में करीब एक साल का वक्त लगा था और इसका निर्माण सन् 1599 में शुरू हुआ था, जो वर्ष 1600 में पूरा हुआ. मुगलकाल में बने इस चर्च से अकबर के ईसाई धर्म और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का पता चलता है.

अकबर का चर्च ताजमहल से भी पुराना है. इस चर्च का निर्माण मुगल बादशाह अकबर ने ताज महल से पहले कराया था. इसे ‘मदर मैरी का महागिरजा घर’ भी कहा जाता है. यह चर्च आगरा के ऐतिहासिक स्थलों में से एक है और कई आक्रमणों तथा पुनर्निर्माण का साक्षी रहा है. इसे मुगलकाल का पहला ईसाई चर्च भी कहा जाता है.
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अकबर का चर्च कई इतिहास के पलों का साक्षी रहा है. ऐसा बताया जाता है कि यह चर्च पुर्तगालियों के बीच हुए मतभेद और अहमद शाह अब्दाली के हमलों से क्षतिग्रस्त हुआ. बाद में जहांगीर ने इसका विस्तार कराया और कई बार इसका पुनर्निर्माण हुआ. यह चर्च आज भी आगरा के वजीरपुरा में स्थित है. वर्तमान में यह चर्च आगरा के कैथोलिक समुदाय का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, हालांकि अब इसके पास बड़ा कैथेड्रल (इमैक्युलेट कॉन्सेप्शन) भी है.

अकबर का चर्च अपने आप में बेमिसाल ईमारत के तौर पर देखा जाता है. इतिहास के अनुसार इसका निर्माण बादशाह अकबर ने अपनी बेगम मरियम की इबादत के लिए बनवाया था. इतिहासकार बताते हैं कि उस वक्त अकबर सभी धर्मों में अकीदा रखने लगे थे. सभी धर्मों के बारे में जानने की उनकी इच्छा थी. इसी दौरान लाहौर से एक पादरी जेसुइट जेविरयर आगरा पहुंचे थे. पादरी ने इच्छा जाहिर की थी कि उसे शहर में एक स्थान दिया जाए जहां वह प्रभु ईसा मसीह की इबादत कर सकें, तब अकबर ने मरियम के कहने पर उस पादरी को यह जगह वजीरपुरा में मुहैया कराई थी. जहां पर यह चर्च बनाया गया है. इसलिए इसे आज अकबर का चर्च के नाम से जाना जाता है.

अकबर का चर्च अपनी खूबसूरत ईमारत से जाना तो जाता है लेकिन इतिहास में इस चर्च ने कई आक्रमणो का सामना भी किया है. इतिहासकारों के अनुसार, पुर्तगालियों में मतभेद होने के कारण सन 1635 में इस चर्च को भारी नुकसान पंहुचा था. कई बार इसमें आग भी लगी थी. ऐसा भी बताया जाता है कि आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली ने भी इस चर्च को क्षतिग्रस्त किया था. बाद में समय-समय पर इसका पुनः निर्माण कराया जाता रहा है.

अकबर के चर्च के बगल में गगनचुंबी घंटी लगी हुई है. बताया जाता है कि यह घंटी पूर्व में जब बजती थी तो शहर में अलग ही आवाज सुनाई देती थी और दूर-दूर तक इस घंटी की आवाज सुनाई देती थी. कुछ समय बाद एक राजा ने इस घंटी को यह कहकर बंद करवा दिया था कि इसकी वजह से बीमार और बूढ़े लोगों को परेशानियां होती है, उसके बाद से इस घंटी को बजाना बंद कर दिया गया. बताया जाता है कि वर्तमान में क्रिसमस के सप्ताह भर पहले से ही यहां तैयारियां शुरू हो जाती है. पूरे चर्च को सजाया जाता है. इस चर्च का शहर में खास महत्व माना जाता है.