मथुरा में CSR फंड के नाम पर काला कारोबार! 130 करोड़ के खर्च पर उठे सवाल, घोटाले की परतें खुलीं

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मथुरा में CSR फंड के नाम पर काला कारोबार! 130 करोड़ के खर्च पर उठे सवाल, घोटाले की परतें खुलीं


मथुरा: उत्तर प्रदेश का मथुरा जितना धार्मिक दृष्टि से विश्व पटल पर महत्व रखता है, उतना ही यहां काले धंधे भी चरम पर हैं. कंपनियों की काली कमाई को सफेद करने में मथुरा अहम भूमिका भी निभाते हैं. यहां 2023-24 में दिए गए (CSR) फंड का जिस तरह से बंदर बांट हुआ, उसकी किसी को कानों-कान खबर तक नहीं हुई. सीएसआर फंड में हुए घोटाले की जब शिकायतकर्ता ने जिला अधिकारी को शिकायत की, तो मामले की परतदार परत खुलना शुरू हुआ. शिकायतकर्ता ने जो तथ्य सामने रखी, वह काफी चौंकाने वाले थे. सीएसआर फंड का काला कारोबार किस तरह से फैला हुआ है और इसकी जड़ें कहां तक हैं, इसकी पूरी कहानी हम आपको बता रहे हैं.

कागजों में दिखा दिए सीएसआर फंड के खर्चे

काले धन को सफेद करने की बात तो अक्सर आपने सुनी ही होगी, लेकिन यह काला धन सफेद कैसे होता है और यह पैसा कहां से आता है, इसे कहां ठिकाने लगाया जाता है, वह हम आपको आज पूरी कहानी बताएंगे. काले धन को सफेद करने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि दर्जनों ऐसे NGO हैं, जो इस धन को सफेद कर मोटा मुनाफा कमा लेते हैं और सरकार को भारी नुकसान झेलना पड़ता है. मथुरा में तकरीबन 130.43 करोड़ रुपए सीएसआर फंड के जरिए भेजा गया.

तीसरे नंबर पर मथुरा का नाम

इस सीएसआर फंड का कहां प्रयोग हुआ, किन-किन क्षेत्रों में यह फंड लगाया गया, किसी को कानों कान खबर नहीं है. नोएडा पहले नंबर पर, वाराणसी दूसरे नंबर पर और मथुरा का तीसरा नंबर सीएसआर फंड घोटाले में सामने आ रहा है. बता दें कि कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के नाम पर मथुरा में हुए भारी निवेश ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. क्या यह वास्तव में सामाजिक विकास का प्रयास है, या फिर CSR फंड्स को ठिकाने लगाने का एक संगठित तंत्र?

वित्तीय वर्ष 2023-24 में मथुरा में 130.43 करोड़ रुपये के CSR व्यय का दावा किया गया है, जिसमें 416 कंपनियों की भागीदारी बताई जाती है. चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश कंपनियां ओडिशा, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे अन्य राज्यों से हैं, जिनकी मथुरा में कोई प्रत्यक्ष औद्योगिक या व्यावसायिक उपस्थिति नहीं है.

इन क्षेत्रों में खर्च दिखाया गया पैसा 

मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (MCA) के अनुसार, इसी अवधि में उत्तर प्रदेश में 2,092 कंपनियों ने कुल 1,545.01 करोड़ रुपये का CSR व्यय दिखाया. विशेषज्ञों का कहना है कि मथुरा जैसे जिले में अन्य राज्यों की कंपनियों द्वारा इतना बड़ा निवेश सामान्य CSR ट्रेंड से अलग है और इसके पीछे कारणों की गहन जांच आवश्यक है. क्षेत्र-वार व्यय के आंकड़े भी कई सवाल खड़े करते हैं.

शिक्षा, दिव्यांगता और आजीविका पर 64.13 करोड़ रुपये और स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, पेयजल और स्वच्छता पर 35.53 करोड़ रुपये खर्च दिखाया गया है, लेकिन स्थानीय स्तर पर न तो बड़े शैक्षिक प्रोजेक्ट दिखाई देते हैं और न ही स्वास्थ्य ढांचे में कोई ठोस बदलाव हुआ. इसके विपरीत, झुग्गी क्षेत्र विकास के लिए मात्र 0.09 करोड़ रुपये का व्यय दर्शाया गया है, जो जमीनी जरूरतों से मेल नहीं खाता है.

तीन सीए हुए थे गिरफ्तार 

इस संदेह को और बल तब मिला, जब आयकर विभाग की अगस्त 2025 की छापेमारी में मथुरा सहित छह राज्यों में 800 करोड़ रुपये से अधिक के CSR फंड डायवर्शन का खुलासा हुआ. जांच में सामने आया कि कई फर्जी ट्रस्टों और NGOs ने कंपनियों से प्राप्त CSR फंड्स को शेल कंपनियों और विदेशी खातों में स्थानांतरित किया. रिपोर्ट्स के अनुसार, इस घोटाले का आकार 5,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. मथुरा-आधारित एक प्रमुख NGO की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है.

नियम हैं, निगरानी नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार, CSR व्यवस्था में पारदर्शिता और स्थानीय सत्यापन की कमी इस समस्या की जड़ है. कई कंपनियां फॉर्म CSR-2 में केवल औपचारिक और संक्षिप्त जानकारी अपलोड कर देती हैं, जबकि प्रोजेक्ट्स की वास्तविक स्थिति का स्थानीय स्तर पर भौतिक सत्यापन नहीं हो पाता. MCA ने 2025 में CSR-1 पंजीकरण अनिवार्य जरूर किया है, लेकिन जमीनी निगरानी तंत्र अब भी कमजोर है.

CSR फंड्स का लाभ कागजों से आगे नहीं

शिकायतकर्ता गौतम ने बताया कि एक बड़ा घोटाला हुआ है. जांच से जुड़े जानकारों का कहना है कि मथुरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व, साथ ही यहां सक्रिय NGO नेटवर्क, अन्य राज्यों की कंपनियों को आकर्षित करता है. ‘शिक्षा’ और ‘स्वास्थ्य’ जैसे संवेदनशील विषयों के नाम पर फंड्स जारी करना आसान होता है, जबकि उनके वास्तविक उपयोग की निगरानी सीमित रहती है. स्थानीय निवासियों का आरोप है कि CSR फंड्स का लाभ कागजों से आगे नहीं बढ़ता. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों में सुधार नजर नहीं आता है.

MCA के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में CSR फंड्स का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा अनुपालन की कमी के कारण अनस्पेंट रह गया, जो व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है. सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि मथुरा की जिला CSR समिति को तत्काल सक्रिय किया जाए, सभी CSR प्रोजेक्ट्स का स्थानीय और स्वतंत्र ऑडिट हो और फर्जी NGOs पर सख्त कार्रवाई की जाए. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो समाजसेवा के लिए बना CSR तंत्र फंड डायवर्शन का सुरक्षित रास्ता बनता चला जाएगा.

मथुरा में CSR व्यय (2023-24)

1. कुल 130.43 करोड़ रुपए.

2. कुल 416 कंपनियां.

3. अधिकांश ओडिशा, दिल्ली, मुंबई, गुजरात एवं पश्चिम बंगाल में स्थित हैं.

4. इनमें से 1 करोड़ रुपए या अधिक व्यय करने वाली 31 कंपनियों की सूची संलग्न है.



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