National Youth Day 2026 : स्वामी विवेकानंद ने कहां बनाई गाजीपुर में कुटिया, 23 दिनों में कैसे बदला सबकुछ

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National Youth Day 2026 : स्वामी विवेकानंद ने कहां बनाई गाजीपुर में कुटिया, 23 दिनों में कैसे बदला सबकुछ


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Swami vivekananda in Ghazipur : राष्ट्रीय युवा दिवस पर स्वामी विवेकानंद के जीवन का वह अध्याय सामने आता है, जब वे 1890 में करीब 23 दिन गाजीपुर में रुके थे. पत्रावली और विवेकानंद की आत्मकथा के अनुसार, यहीं पवहारी बाबा के सान्निध्य में उनके मन में साधना और राष्ट्र सेवा के बीच गहरा द्वंद्व चला, जिसने आगे चलकर उनके जीवन की दिशा तय की. स्वामी विवेकानंद जनवरी 1890 से मार्च 1890 तक गाजीपुर में रुके. उस समय वे एक जिज्ञासु संन्यासी के रूप में भ्रमण कर रहे थे. यहीं जान पाए कि उनका जन्म अंधकार में गिरे भारत को उठाने के लिए हुआ है.

गाजीपुर. आज 12 जनवरी 2026 को स्वामी विवेकानंद की जयंती (राष्ट्रीय युवा दिवस) के अवसर पर, हम उनके जीवन के उस जरूरी अध्याय को याद कर रहे हैं जो उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में बीता. 1890 की शुरुआत में स्वामी जी की इस यात्रा ने उनके भविष्य के मिशन की नींव रखी थी. स्वामी विवेकानंद जनवरी 1890 से मार्च 1890 तक गाजीपुर में रुके थे. उस समय वे एक जिज्ञासु संन्यासी के रूप में भ्रमण कर रहे थे. उन्होंने गाजीपुर के सिद्ध संत पवहारी बाबा की महानता के बारे में सुना था. पवहारी बाबा एक अद्भुत तपस्वी थे, जो गाजीपुर में एक गुफा में रहते थे और केवल हवा (पवन) का आहार करने के कारण ‘पवहारी’ कहलाते थे.
​स्वामी जी गाजीपुर के गोरा बाजार में अपने बचपन के मित्र सतीश चंद्र मुखर्जी के घर ठहरे. वे बाबा से हठयोग और वेदांत की शिक्षा लेना चाहते थे.

स्वामी विवेकानंद की पत्रावली और उनकी आत्मकथा के अनुसार, गाजीपुर में स्वामी जी के मन में एक गहरा मानसिक संघर्ष चल रहा था. पवहारी बाबा के प्रति उनके सम्मान का वर्णन करते हुए स्वामी जी ने लिखा-

“​निस्संदेह ये एक महान योगी हैं. आज के इस नास्तिक युग में वे भक्ति तथा योग की अद्भुत क्षमता का उदाहरण हैं.”

​वे बाबा से दीक्षा लेने के लिए इतने व्याकुल थे कि उन्होंने उनके आश्रम के पास ही एक कुटिया बना ली, लेकिन तभी उनके मन में अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाएं गूंजने लगतीं. उन्हें महसूस होता कि गुरु उन्हें याद दिला रहे हैं कि उनका जन्म व्यक्तिगत योग-साधना के लिए नहीं, बल्कि अंधकार में गिरे भारत को उठाने के लिए हुआ है. ​गाजीपुर प्रवास के दौरान ही अलवर के महाराजा के साथ हुआ उनका प्रसिद्ध संवाद भी उल्लेखनीय है (जो इस पुस्तक में दर्ज है). जब महाराजा ने मूर्तियों के प्रति अनादर दिखाया, तो स्वामी जी ने प्रतीकवाद का सहारा लिया. उन्होंने राजा के चित्र का उदाहरण देकर समझाया कि जैसे एक प्रजा अपने राजा के चित्र का अपमान नहीं सह सकती क्योंकि उसमें राजा का भाव है, ठीक वैसे ही एक भक्त मूर्ति में ईश्वर का भाव देखता है. यह तार्किक स्पष्टता स्वामी जी के गाजीपुर प्रवास की एक बड़ी उपलब्धि थी.

​गाजीपुर से शिकागो 

​गाजीपुर में करीब 3 महीने बिताने, स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों को झेलने और पवहारी बाबा का आशीर्वाद लेने के बाद स्वामी जी वाराणसी की ओर निकल गए. गाजीपुर की इसी आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ उन्होंने आगे बढ़कर 11 सितंबर 1893 को शिकागो के विश्व धर्म संसद में भारत का गौरव बढ़ाया.

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Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

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