Ground Report: कुष्ठ आश्रम जर्जर, रोगी और परिवार दान-पुण्य पर जी रहे जीवन, लेकिन प्रशासन फिर भी सुस्त!

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Ground Report: कुष्ठ आश्रम जर्जर, रोगी और परिवार दान-पुण्य पर जी रहे जीवन, लेकिन प्रशासन फिर भी सुस्त!


बहराइच. कुछ अरसा पहले बना कुष्ठ आश्रम अब समाप्ति की कगार पर है, शुरुआती दौर में 20 कमरे बनाए गए थे, जिन्हें कुष्ठ रोगियों को रहने के लिए दिया गया था. धीरे-धीरे जब रोगियों की संख्या बढ़ी तो कुछ रोगियों ने मड़ैया तानकर अपना गुजर-बसर करना शुरू किया. समय के साथ-साथ अब बने हुए कमरे पूरी तरह जर्जर होते जा रहे हैं. बरसात में ऐसा लगता है जैसे आसमान का पानी सीधे बिस्तर पर आता हो, अब छत भी टपकने लगी है. इसके अलावा प्रशासन भी इन पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है. गवर्नमेंट की स्कीम के तहत इन्हें ₹3,000 प्रति माह दिया जाता है, जिसमें उनका गुजर-बसर नहीं होता क्योंकि उनके परिवार भी हैं.

कुष्ठ आश्रम धीरे-धीरे समाप्ति की कगार पर

कुष्ठ आश्रम में रहने वाले रोगियों और उनके परिवार वालों ने बताया कि शुरुआती दौर में जब 20 कमरे दिए गए थे, तब स्थिति ठीक थी. लेकिन धीरे-धीरे ऐसा हुआ जैसे प्रशासन ने इन पर ध्यान देना ही बंद कर दिया हो. समय के साथ कमरे पूरी तरह जर्जर हो गए। बरसात के दिनों में पानी टपकना, दीवारों से मसाले गिरना आम बात हो गई. इसके अलावा 7 नए परिवार भी आश्रम में शामिल हो गए हैं, जिससे और भी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. बढ़े हुए परिवार किसी तरह से ग्राउंड में बांस और प्लास्टिक की मड़ैया तानकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं.

कुष्ठ आश्रम पर प्रशासन को ध्यान देने की जरूरत नहीं तो अस्तित्व समाप्त

कुष्ठ रोगियों ने बताया कि शहर में मौजूद प्रशासन या आश्रम प्रशासन की नजर से यह आश्रम बेहद ओझिल है. सफाई की बात करें तो यहां सफाई नाम की कोई चीज नहीं है, नगरपालिका प्रशासन भी इस पर ध्यान नहीं देता. सरकार जो कुष्ठ रोगियों को ₹100 प्रतिदिन के हिसाब से देती है, उसमें भी उनका गुजर-बसर संभव नहीं है. कई रोगी कबाड़ बीनकर या अन्य किसी काम के जरिए अपने जीवन की व्यवस्था करते हैं, एक परिवार में अगर एक कुष्ठ रोगी है, तो परिवार के अन्य लोग भी उसी पर निर्भर हैं.

दान-पुण्य के सहारे चल रहा आश्रम

आश्रम में रहने वाले रोगियों ने बताया कि ₹3,000 प्रतिमा मिलने वाला लाभ बहुत कम है, जिसमें जीवन यापन करना बेहद मुश्किल है. आश्रम की रोजमर्रा की जिंदगी शहर के लोगों के दान-पुण्य पर ही निर्भर है. लोग कभी-कभार या त्योहारों के समय खाने की सामग्री, पूड़ी, सब्जी, मिठाई आदि लाते हैं. लेकिन आम दिनों में जीवन यापन करना कठिन है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो धीरे-धीरे आश्रम का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और कुष्ठ रोगी सड़क पर आ जाएंगे.रोगियों ने बताया कि यहां का शौचालय भी ठीक नहीं है और मुख्य गेट भी गिरने की कगार पर है. उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया है कि नए कमरे बनाए जाएं, सुख-सुविधा के लिए शौचालय का पुनर्निर्माण किया जाए और सफाई की व्यवस्था का जिम्मा उठाया जाए.



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