“हमें दया नहीं अधिकार चाहिए”… झांसी में इस संदेश के साथ सड़कों पर उतरे दिव्यांग

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“हमें दया नहीं अधिकार चाहिए”… झांसी में इस संदेश के साथ सड़कों पर उतरे दिव्यांग


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इस यात्रा को निकालने का उद्देश्य जागरूकता फैलाना था. आयोजक का कहना था कि समाज में सोच बदलना बहुत जरूरी है. दिव्यांग जन को दया नहीं अधिकार चाहिए. उन्हें पढ़ाई का पूरा हक मिलना चाहिए. उन्हें नौकरी में समान अवसर मिलना चाहिए. यात्रा के दौरान कई दिव्यांग जन ने खुलकर अपनी बात रखी.

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झांसी में दिव्यांग यात्रा निकाली गई. इस यात्रा का मकसद समाज को एक साफ संदेश देना था. संदेश यह था कि दिव्यांग जन किसी से कम नहीं है. वे भी सम्मान चाहते है. वे भी बराबरी का हक चाहते है. इस यात्रा में शहर के कई दिव्यांग भाई बहन शामिल हुए. उनके साथ उनके परिवार के लोग भी कदम से कदम मिलाकर चले. कई सामाजिक लोग भी साथ दिखे. सभी के हाथ में तख्ती थी. कुछ तख्ती पर लिखा था हमें सम्मान दो. कुछ पर लिखा था हमें अवसर दो. कुछ पर लिखा था हमें शिक्षा दो. यात्रा जब सड़कों से गुजरी तब लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने लगी. रास्ते में खड़े लोग उन्हें देख रहे थे. कई लोग ताली बजाकर उनका हौसला बढ़ा रहे थे. माहौल में उत्साह भी था और भावुकता भी थी.

इस यात्रा को निकालने का उद्देश्य जागरूकता फैलाना था. आयोजक का कहना था कि समाज में सोच बदलना बहुत जरूरी है. दिव्यांग जन को दया नहीं अधिकार चाहिए. उन्हें पढ़ाई का पूरा हक मिलना चाहिए. उन्हें नौकरी में समान अवसर मिलना चाहिए. यात्रा के दौरान कई दिव्यांग जन ने खुलकर अपनी बात रखी. एक युवक ने कहा कि हमें मौका मिलेगा तो हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकते हैं. एक बहन ने कहा कि हमें घर की चार दीवार में मत रोको हमें भी अपने सपने पूरे करने दो.

कुछ लोगों ने कहा कि सरकारी योजना का लाभ समय पर मिलना चाहिए ताकि जीवन आसान हो सके. उनकी आवाज में आत्मविश्वास था. उनके चेहरे पर उम्मीद की चमक थी. इस यात्रा के कई फायदे हो सकते है. सबसे बड़ा लाभ यह है कि समाज में समझ बढ़ेगी. लोग दिव्यांग जन को नई नजर से देखेंगे. बच्चे भी सीखेंगे कि सभी बराबर हैं. यह संदेश सरकार तक भी पहुंचेगा. जब सुविधा बढ़ेगी तब जीवन सरल होगा. रास्तों पर रैंप बनेगा. स्कूल में सहायक साधन मिलेंगे.

दफ्तर में भी अवसर मिलेंगे. ऐसी यात्रा से हौसला मजबूत होता है. जब सभी एक साथ चलते हैं तब एकता की ताकत दिखती है. झांसी में निकली यह यात्रा नई सोच की शुरुआत बन सकती है. इससे सम्मान का रास्ता खुलेगा और समाज में बराबरी की भावना मजबूत होगी. यही इस पहल की असली जीत मानी जा रही है.



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