कानपुर का दिल और आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है बिठूर, यहीं से जली थी आजादी की चिंगारी
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Bithoor Festival 2026: बिठूर को कानपुर का दिल कहा जाता है. ऐतिहासिक, धार्मिक और क्रांतिकारी महत्व के कारण जब भी कानपुर की पहचान की बात होती है, तो सबसे पहले बिठूर का नाम लिया जाता है. यही वह पावन भूमि है जहां से आजादी की क्रांति की चिंगारी भड़की और जिसने देश के इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई. बिठूर कानपुर का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र माना जाता है. यहां प्राचीन मंदिर, घाट और ऐतिहासिक धरोहर आज भी मौजूद हैं, जो इसकी गौरवशाली विरासत की गवाही देते हैं. धार्मिक आस्था के साथ-साथ यहां का वार्षिक महोत्सव भी कानपुर का सबसे बड़ा आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से लोग शामिल होते हैं. इतिहास आस्था और संस्कृति का संगम ही बिठूर को खास बनाता है.
कानपुर की धार्मिक नगरी के रूप में जाने जाने वाली तीर्थ नगरी बिठूर में तीन दिवसीय बिठूर महोत्सव का शुरुआत हो गई है. इस बार एक खास अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है. गंगा तट की पवन हवा रोशनी से सजा भव्य मंच और हजारों लोगों की मौजूदगी ने पहले ही दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम को एक महाकुंभ का रूप दे दिया. स्वास्थ्य वचन और दीप प्रजनन के साथ कार्यक्रम की शुभारंभ हुई. इस दौरान कानपुर के जनप्रतिनिधि और प्रसाद सैनिक अधिकारी मौजूद रहे. कानपुर का बिठूर अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है.

आपको बता दे हर साल इस महोत्सव का आयोजन होता है और कानपुर का सबसे बड़ा महोत्सव यह है. यहां पर कानपुर की एक सांस्कृतिक और अनोखी छठ देखने को मिलती है. आज से इस तीन दिवसी महोत्सव की शुरुआत हो गई. वहीं मुख्य अतिथियों ने अपने संबोधन में कहा कि बिठूर केवल एक तीर्थ स्थल नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवन धरोहर है. ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को मंच मिलता है. वहीं नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है.

बिठूर कानपुर के हिसाब से सबसे महत्वपूर्ण जगह है. गंगा किनारे बसा यह सुंदर इलाका कानपुर का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र रहा है. यहां पर माता सीता और लव कुश से जुड़ी मान्यताएं हैं. लव कुश का जन्म भी यही हुआ है. जिस वजह से इसका धार्मिक महत्व अधिक है. यही वजह है कि प्रत्येक साल होने वाले इस महोत्सव में खास धार्मिक और सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है. वही बिठूर तेजी से विकास और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ने का काम किया जा रहा है.
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इस मौसम की शुरुआत बिठूर के लिए तैयार किए गए खास गीत से हुई. जय हो धरा बिठूर ने वहां मौजूद हर किसी को जमा कर रख दिया और भक्ति में माहौल बना दिया. मां गंगा की कलकल धाराओं ऋषियों की तपोभूमि का गीत सुनकर हर कोई मंत्र मुक्त हो गया. यह परिसर पूरी तरीके से आध्यात्मिक और देशभक्ति से जुड़ा हुआ रहा क्योंकि क्रांति की लड़ाई में भी बिठूर का एक अहम योगदान रहा है. नाना राव पेशवा से लेकर कई क्रांतिकारी यहीं से निकले हैं. उसकी भी झलक यहां पर देखने को मिली.

कार्यक्रम की शुरुआत में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए. वहीं शास्त्री नृत्य की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्र मुक्त कर दिया. भाव ले और लाल के संगम ने कुछ देर के लिए पूरे परिसरों को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया दर्शकों ने तालिया बजाकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया हजारों दर्शक इस महोत्सव में शामिल होने के लिए पहुंचे हैं. आपको बता दें कानपुर के प्रभारी मंत्री समेत शहर के बड़े दिग्गज जनप्रतिनिधि और उद्योगपति भी पहुंचे.

शाम ढलते ही मंच पर मशहूर बैंड यूफोरिया की एंट्री ने माहौल को पूरी तरीके से बदल दिया. इस बंद के प्रमुख गायक पलाश सेन ने जैसे ही कभी आना तू मेरी गली गया तो वहां मौजूद युवा दर्शक झूम उठे मायरी और आगे जाने राम क्या होगा जैसे गीतों ने एक अलग समा बांध दिया वहीं देशभक्ति के गीतों के दौरान लोगों ने अपनी मोबाइल फोन की फ्लैशलाइट जलाकर वातावरण को और यादगार बना दिया.

गिटार और ड्रम की धो के बीच गंगा तक रॉक कंसर्ट में तब्दील हो गया. रंग बिरंगी लाइट्स और साउंड इफेक्ट ने रात को और भी खास बना दिया. हजारों की भीड़ में बच्चे युवा और बुजुर्ग सभी संगीत की लैब पर थी रखते हुए नजर आए कलाकारों ने बिठूर की ऐतिहासिक धरती का जिक्र कर शिक्षकों से सीधा जुड़ाव बनाया देर रात तक कार्यक्रम पूरे उत्सव और ऊर्जा के साथ चलता रहा. वहीं महोत्सव में 66 प्रजातियों के फूलों की प्रदर्शनी ने भी सब का ध्यान अपनी ओर खींचा. यहां पर कई पारंपरिक हस्तशिल्प बिठूर के मिट्टी के बर्तन लकड़ी के खिलौने के भी स्टाल लगाए गए हैं. इसके साथ ही रक्षा उत्पादन हो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रदर्शनी ने युवाओं को खासा आकर्षित किया.