‘कई बार लगता है, हमारी कोई कीमत नहीं है’, ऑटो चालक किन बोझ तले कैसे जीता है?
गाजियाबाद : शहर की रफ्तार को आगे बढ़ाने वाले चेहरों में ऑटो चालक सबसे आगे दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी की रफ्तार कैसी होती है यह बहुत कम लोग जानते हैं. सुबह की पहली किरण से पहले घर से निकलना और रात की आखिरी थकान के साथ लौटना यही उनकी दिनचर्या है. सड़कों की भीड़, यात्रियों का व्यवहार, ट्रैफिक का दबाव, कमाई की अनिश्चितता और परिवार की जिम्मेदारियां इन सबके बीच एक ऑटो चालक हर दिन खुद से लड़ता है. उसकी जिंदगी सिर्फ गाड़ी चलाने तक सीमित नहीं होती बल्कि वह अपने सपनों, संघर्षों और उम्मीदों का पहिया भी साथ घुमाता है.
एक ऑटो ड्राइवर की जिंदगी रोजाना किन संघर्षों से गुजरती है, आइये आपको बताते हैं इस रिपोर्ट में (ऊपर वीडियो भी देखें)..
गाजियाबाद के दीनगढ़ी क्षेत्र के रहने वाले पिंकू गौतम पिछले 30 वर्षों से ऑटो चला रहे हैं. परिवार में पत्नी, तीन बेटियां और दो बेटे हैं. कुल सात सदस्यों का पालन-पोषण उनकी कमाई पर निर्भर है. पिंकू की सुबह 4:30 बजे शुरू होती है. शहर सो रहा होता है, लेकिन उनके घर में हलचल शुरू हो जाती है. वे सबसे पहले अपने ऑटो को साफ करते हैं फिर भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं और ऑटो के सामने हाथ जोड़कर घर से निकलते हैं. उनके लिए यह सिर्फ एक वाहन नहीं बल्कि परिवार की रोजी-रोटी का साधन है.
सुबह 4:30 बजे घर से निकलकर पिंकू सीधे गाजियाबाद रेलवे स्टेशन और पुराने बस अड्डे की ओर रुख करते हैं. दिनभर उनका रूट डायमंड फ्लाईओवर से बम्हेटा तक रहता है. सवारियों का इंतजार, ट्रैफिक जाम, धूल और शोर इन सबके बीच उनका दिन गुजरता है. रात करीब 10 बजे वे घर लौटते हैं. लगभग 17 घंटे की यह मेहनत रोज की दिनचर्या बन चुकी है. पिंकू कहते हैं काम के चलते न दिन का पता चलता है न रात का.
महीने की आखिर तो दिक्कतों से भरी होती है
ऑटो चलाकर पिंकू की रोजाना करीब 800 रुपये की कमाई हो जाती है, लेकिन खर्चे इतने हैं कि महीने के अंत तक संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है. सीएनजी का खर्च, ऑटो की सर्विस और मरम्मत, बच्चों की फीस, घर का राशन और अन्य जरूरतें हर चीज की जिम्मेदारी उन्हीं पर है. कई बार ऐसा भी होता है कि दिन भर मेहनत के बावजूद कमाई उम्मीद से कम रहती है. ऐसे में घर का बजट बिगड़ जाता है और समझ नहीं आता कि पहले कौन-सी जरूरत पूरी की जाए.
पिंकू बताते हैं कि सड़क पर संघर्ष सिर्फ ट्रैफिक से नहीं होता. कई बार अन्य वाहन चालक भला-बुरा कह देते हैं. कभी ट्रैफिक पुलिस की डांट सुननी पड़ती है तो कभी किराए को लेकर सवारी से बहस हो जाती है. कुछ यात्री अपशब्दों का इस्तेमाल भी कर देते हैं. हालांकि कई सवारियां ऐसी भी मिलती हैं जो सम्मान देती हैं और अच्छा व्यवहार करती हैं, लेकिन बुरे अनुभव मन पर असर छोड़ जाते हैं. उनका कहना है कि कई बार ऐसा महसूस होता है जैसे ऑटो चालक की जिंदगी की कोई कीमत ही नहीं है.
अब कमाई 70 प्रतिशत तक घटी
पिंकू ने डीजल ऑटो का दौर भी देखा है और अब सीएनजी ऑटो चला रहे हैं. उनका कहना है कि पहले काम बेहतर था, लेकिन अब ओला-उबर जैसी सेवाएं आने के बाद ऑटो चालकों के काम पर बड़ा असर पड़ा है. करीब 70 प्रतिशत तक काम में कमी आई है. लोग ऐप से गाड़ी बुक करना ज्यादा पसंद करते हैं, जिससे स्टैंड पर घंटों इंतजार करना पड़ता है.
पिंकू ने बताया कि कई बार उनके मन में यह विचार भी आया कि ऑटो चलाना छोड़ दें, लेकिन जिम्मेदारियां उन्हें ऐसा करने नहीं देतीं. तीन बेटियों और दो बेटों की पढ़ाई और भविष्य की चिंता उन्हें हर सुबह दोबारा स्टीयरिंग थामने के लिए मजबूर कर देती है. पिंकू साफ कहते हैं कि वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे ऑटो चलाएं. उनका सपना है कि बच्चे पढ़-लिखकर अच्छा भविष्य बनाएं और जिंदगी में वह संघर्ष न झेलें जो उन्होंने झेला है.
सुबह अंधेरे में शुरू होने वाला यह सफर रात के अंधेरे में खत्म जरूर होता है, लेकिन पिंकू की उम्मीदें अब भी रोशन हैं. संघर्ष भरी जिंदगी के बावजूद उनके भीतर विश्वास है कि उनकी मेहनत एक दिन रंग लाएगी और बच्चों का भविष्य संवार देगी. यही उम्मीद उन्हें हर दिन फिर से सड़कों पर उतरने की ताकत देती है.