फिर से जिंदा होगी सुल्तानपुर की यह प्राचीन नदी, जिला प्रशासन ने बनाया यह मास्टर प्लान!

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फिर से जिंदा होगी सुल्तानपुर की यह प्राचीन नदी, जिला प्रशासन ने बनाया यह मास्टर प्लान!


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मझुई नदी जो कभी सुल्तानपुर के हजारों लोगों के लिए मुख्य जल स्रोत थी, आज अतिक्रमण और उपेक्षा के कारण नाले में सिमट गई है. अब इसके पुनरुद्धार के लिए सरकार विशेष नदी पुनर्जीवन योजना ला रही है, जिसमें राजस्व, मनरेगा, पंचायती राज, मत्स्य पालन, सिंचाई और प्रदूषण नियंत्रण जैसे कई विभाग मिलकर कार्ययोजना तैयार करेंगे.

सुल्तानपुर. नदी, पहाड़, पर्वत यह सब प्रकृति के महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं, लेकिन आबादी के तेजी से बढ़ते दबाव के कारण लगातार इनका दोहन होता चला जा रहा है. इसी का एक उदाहरण उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में मिलता है, जहां की स्थानीय नदी जिसे मझुई नदी कहा जाता है. यह पहले सुल्तानपुर के हजारों आबादी का एक मुख्य जल स्रोत हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ अतिक्रमण और देखरेख के अभाव में यह नदी नाले में सीमित हो गई. अब शासन द्वारा इस नदी के पुनरुत्थान के लिए एक विशेष योजना लाई जा रही है. जिसके तहत मझुई नदी का पुनः उत्थान करने का प्रयास किया जाएगा और सबसे खास बात यह है कि इस नदी के उत्थान के लिए सिर्फ कोई एक विशेष विभाग नहीं है, बल्कि कई विभाग मिलकर आपस में काम करेंगे.

इन विभागों को मिली जिम्मेदारी 
मुख्य विकास अधिकारी विनय कुमार ने बताया कि नदी पुनर्जीवन योजना के तहत सुल्तानपुर में मझुई नदी के कार्य योजना बनाने के लिए कई विभागों को जिम्मेदारी दी गई है इसके लिए राजस्व विभाग, मनरेगा, पंचायती राज विभाग, मत्स्य पालन विभाग, सिंचाई और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जिम्मेदारी सौंप गई है. यह विभाग जल्द ही कार्य योजना बनाकर शासन को भेजेंगे, जिससे इस नदी के पुनरूत्थान की दिशा में काम किया जा सके. आपको बता दें कि इस नदी को संरक्षित और पुनरूत्थान के लिए वर्षों से स्थानीय लोगों द्वारा मांग की जाती रही है. इस योजना के तहत नदी से अतिक्रमण हटाने,साफ सफाई के इंतजाम और नदी की चौड़ाई को पुनः उसी दिशा में ले जाने और वृक्षारोपण के माध्यम से कार्य किए जाएंगे.

सिंचाई का थी साधन 
इस नदी के तट पर कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन की परंपरा सदियों पुरानी रही है. पुराने समय में जब नहरों और आधुनिक सिंचाई साधनों का अभाव था, तब मझुई नदी ही किसानों के लिए जीवनरेखा हुआ करती थी. इसके पानी से खेतों में फसलें लहलहाती थी और गांवों की अर्थव्यवस्था सशक्त होती थी. इतिहासकारों और स्थानीय बुज़ुर्गों के अनुसार, मझुई नदी के किनारे कई छोटे-बड़े मेले, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक आयोजन हुआ करते थे. छठ पूजा, स्नान पर्व और अन्य लोक पर्वों पर दूर-दराज़ से लोग इस नदी के घाटों पर एकत्र होते थे. इससे यह स्पष्ट होता है कि मझुई नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत गहरा रहा है. यह नदी सुल्तानपुर के चार ब्लॉक दोस्तपुर कूरेभार, जयसिंहपुर और अखंड नगर से होकर प्रवाहित होती है और आजमगढ़ में समाप्त हो जाती है. लगभग 73 किलोमीटर सुल्तानपुर में बहने के बाद यह 45 गांव को कवर करती है.

ब्रिटिश काल 
ब्रिटिश काल में भी मझुई नदी का उपयोग स्थानीय परिवहन, सिंचाई और ग्रामीण संपर्क मार्ग के रूप में किया जाता था. नदी के आसपास बने पुराने घाट, कच्चे तटबंध और पगडंडियां आज भी इसके ऐतिहासिक अस्तित्व की गवाही देती हैं. समय के साथ भले ही मझुई नदी की धारा कमजोर हुई हो, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व आज भी जीवित है.

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Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें



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